कुपोषण को प्रभावित करने वाले कारण दो हैं -
1. भोजन संबंधी -
1) अपर्याप्त भोजन 2) अनुपयुक्त भोजन 3) अनुचित भोजन 4) भोजन संबंधी आदतें ।
2. सामान्य कारण-
1) अस्वास्थ्यकर वातावरण 2) निद्रा की कमी 3) अत्यधिक कार्य 4) सामाजिक एवं आर्थिक कारण 5) रोगात्मक कारण
6) जनसंख्या 7) व्यवसायिक कारण ।
1. भोजन संबंधी कारण
1) अपर्याप्त भोजन (Inadequate Food) - कुपोषण का एक प्रमुख कारण की
आवश्यकतानुसार, उम्र, जलवायु, लिंग, व्यवसाय आदि को ध्यान में रखते हुए यदि पौष्टिक भोजन का अभाव हो जाए तो वह कुपोषित हो जाता है और कई तत्वों की कमी हो जाती है जो शरीर के स्वास्थ्य एवं वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक है ।
2) अनुपयुक्त आहार (Unsuitable food) मनुष्य का भोजन उम्र, लिंग तथा कार्य के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है । यदि इन बातों को ध्यान में न रखा जाये और भोजन कैसा भी ग्रहण किया जाए तो वह कुपोषण का कारण बन जाता है
3) अनुचित भोजन (Improper food) - कुछ भोजन अपेक्षाकृत अपचनशील होता है । यदि ऐसा अपचनशील भोजन निरन्तर प्रयुक्त किया जायेगा तो भोजन में ऐसे तत्वों की अधिकता आ जायेगी, तो उत्तम पोषण के लिए कदापि उचित नहीं होगा ।
4) भोजन संबंधी आदतें (Food Habits) - कुपोषण का कारण मनुष्य की आदतें भी हो सकती हैं, क्योंकि मनुष्य अपनी आदत को अनुसार भोजन लेना ज्यादा पंसद करते हैं। चाहे वह भोजन पौष्टिक हो या न हो । जैसे-चावल खाने वाले बाजरा, गेहूँ पसन्द नहीं करते हैं इसके विपरीत गेहूँ खाने वाले चावल, मक्का, बाजरा पसन्द नहीं करते हैं ।
आजकल व्यक्ति चाय, कॉफी, कोको या मादक पेय पदार्थों का सेवन अधिक करते हैं। ये पदार्थ कैलोरी तो अवश्य प्रदान करते हैं परन्तु इनमें पोषक तत्वों का अभाव होता है, जिसके कारण वे कुपोषण के शिकार हो जाते हैं इसके अलावा समय-कुसमय भोजन लिया जाए या जल्दी जल्दी खाया जाये तो पाचन संस्थान में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है। इससे प्रायः अपच, बदहजमी रहेगी परिणामतः कुपोषण होगा ।
2. सामान्य कारण
1) अस्वास्थ्यकर वातावरण
उचित पोषण हेतु केवल उपयुक्त आहार ही पर्याप्त नहीं होता है बल्कि अच्छा वातावरण भी आवश्यक है। जैसे-सूर्य का प्रकाश, शुद्ध व ताजी हवा आदि । ताजी हवा एवं सूर्य के प्रकाश की कमी कुपोषण की स्थिति उत्पन्न करने में सहायक होगी ।
2) निद्रा की कमी (Lack of Sleep) - अत्याधिक कार्य की वजह से कभी-कभी नींद पूरी नहीं हो पाती है या सोने का उचित प्रबंध न होने या शयनकक्ष में भीड़-भाड़ होने से भी नींद पूरी नहीं हो पाती है तो पोषण उचित रूप से नहीं हो पाता ।
3) अत्यधिक कार्य (Over Work ) - कार्य की अधिकता से भी पोषण उचित रूप से नहीं हो पाता ।
4) सामाजिक व आर्थिक कारण (Social & Economic Reason ) - हमारे समाज कुछ ऐसी मान्यताएं हैं जिससे मनुष्य के पोषण पर अत्यधिक बुरा प्रभाव पड़ता है । जैसे-लम्बी अवधि के लिए उपवास रखना, टमाटर या चुकन्दर का प्रयोग न करना क्योंकि उसमें रक्त के रंग का रस मिला है गाजर का प्रयोग नहीं करना, कटहल का प्रयोग नहीं करना क्योंकि उसमें मांस की तरह रेशे होते हैं । इसके अलावा लहसुन, प्याज आदि का भी प्रयोग न
करना । ये सभी मान्यताएं भ्रमक हैं और व्यक्ति में पोषणात्मक विकारों का कारण बन जाती हैं।
भारतवर्ष एक कृषि प्रधन देश है। अतः यहाँ पर सभी प्रकार के भोज्य पदार्थ उलब्ध हैं । अज्ञानता के कारण अधिकांश जनता विटामिन, खनिज पदार्थ और प्रोटीन युक्त पदार्थों का प्रयोग नहीं करते । भोज्य पदार्थों को पकाने की सही विधि भी नहीं जानते हैं, जिसके कारण उनको उचित पोषण नहीं मिल पाता है।
5) रोगात्मक कारक (Pathological Reason) - मानसिक पेरशानी, चिन्ता, निराशा या असफलता आदि से मनुष्य भोजन के प्रति उदासीन हो जाता है और वह कुपोषण का शिकार हो जाता है ।
6) जनसंख्या (Population) - जनसंख्या की अधिकता की वजह से सभी भोज्य पदार्थों का वितरण समान नहीं हो पाता कुछ भोज्य पदार्थ जैसे -दूध, अण्डा, मेवे आदि का उत्पादन जनसंख्या के अनुपात में कम होता है । अतः ये महँगे हो जाते हैं और इनका सेवन कुछ लोगों तक सीमित रह जाता है आम लोगों की पहुंच में से ये साधन नहीं रह जाते ।
7) व्यावसायिक कारण- वर्तमान समय में पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं और अधिक समय घर से बाहर रहते हैं एवं बाहरी भोज्य पदार्थ का उपयोग कर लेते हैं एवं शरीर में विटामिन एवं खनिज लवणों की पर्याप्त कमी हो जाती है एवं कुपोषण उत्पन्न हो जाता है ।