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बुंदेलखंड विश्वकोश

अक्षर: उ

अक्षर 'उ' से शुरू होने वाली कहावतें

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उधारवारो पासंग1 नई देखत।

(1.तराजू के दोनों पलड़ों का बराबर न होने की स्थिति) उधार लेने वाला इस बात की परवाह नहीं करता कि सौदा ठीक तौल कर दिया गया है अथवा नहीं, क्योंकि उसे तो किसी प्रकार सौदा लेना है।

उन बिगर कौन मँड़वा अटको।

उनके बिना क्या विवाह का मंडप गड़ने को रुका है? जब कोई व्यक्ति बुलाने से भी न आये तब प्रयुक्त। तात्पर्य यह कि नहीं आते तो न आयें, उनके विना काम पड़ा नहीं रहेगा। तुल० जहाँ मुरगा नहीं होता वहाँ क्या सबेरा नहीं होता ?

उनकी पई काऊ ने नई खाई।

उनके हाथ की बनी रोटी कोई नहीं खा पाया। स्वार्थी व्यक्ति के लिए प्रयुक्त।

उपास के न तिरास के, फरार1 कों जम से।

(1.फलाहार।) काम का तो बूता नहीं, पर खाने को बहादुर हैं।

उपेटो लगत सो आँख खोल के चलत।

जिसे ठोकर लगती है वह आँख खोल कर चलता है।

उरदनई खों जोतत।

उर्दों को ही जोतते हैं। एक ही बात की रट लगाये हैं।

उरबतिया1 को पानी सँगरी नई चड़त।

(1.छप्पर के ढाल का आगे का हिस्सा जिससे वर्षा का जल नीचे टपकता है; ओलती। 2.छप्पर के ऊपर का हिस्सा।) ओलती का पानी मंगरी पर नहीं चढ़ता, वह तो नीचे धरती पर ही आता है। असंभव बात संभव नहीं होती।

उल्टी आँतें गरें परीं।

गये थे सुलझने, उल्टे उलझ गये।

उल्टो चोर गुसंयें डाँटे।

अपराध करके स्वयं उसी मनुष्य को झिड़कना जिसका नुकसान हुआ हो।