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अक्षर: ऊ

अक्षर 'ऊ' से शुरू होने वाली कहावतें

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ऊँटन खेती नई होत।

ऊँटों से खेती नहीं होती। हर काम के लिए उपयुक्त साधन की आवश्यकता होती है।

ऊदल ब्याहन को ना रहें, बातें कैबे कों रै जैहें।

अर्थात किसी एक व्यक्ति विशेष के बिना काम अटका नहीं रहेगा, परन्तु बात कहने को रह जायगी कि अवसर पर साथ नहीं दिया।

ऊधों को लैन, न माधौ कौ दैन।

ऐसे निश्चिन्त मनुष्य का कयन जिसे किसी का कुछ लेना-देना नहीं।

ऊधौ बन आये की बात।

कार्य सफल होने पर लोग प्रशंसा करते हैं, अन्यथा वे ही लोग बुराई करने लगते हैं।

ऊनें सो बरसेई।

बादल जब घिरे हैं तब बरस कर ही रहेंगे।

ऊमर कौ बिरमांड।

ऊमर का ब्रह्मांड। साधारण काम को जबरदस्ती महत्त्व देना।

ऊमर फोरो न पखा उड़ाओ।

न कोई बुरा काम करो और न उसका परिणाम भोगना पड़े।

ऊसरा कौ बीज।

ऊसर का बीज। व्यर्थ परिश्रम। ऊसर जमीन में बीज बोने से नहीं उगता।