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अक्षर: भ

अक्षर 'भ' से शुरू होने वाली कहावतें

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भाग्ग बदो सो होय।

जो भाग्य में लिखा होता है वही होता है।

भाग्गी कें भूत कमाऊत।

भाग्यवानों के सब काम अपने आप हो जाते हैं।

भाँड़न के घोड़े, खायें भौत चलें थोड़े।

बड़े आदमियों के नौकरों के लिए कहते हैं।

भाँडन के संग खेती करी, गा बजा कें अपनी करी।

भाँड़ों के साथ खेती की जाय तो कोई उनसे क्या वसूल कर लेगा ? गा-बजा कर वे तो उसे अपना बना लेंगे।

भाँड़ी भई है तौ दो छाबें और सई।

बात बिगड़ी है तौ दो छबले और सही। अर्थात बदनामी ही जब हुई है तो व्यर्थ खर्च क्यों किया जाय ?

भारी ब्याज मूल कों खाये।

बहुत ब्याज के लोभ में मूल भी मारा जाता है।

भिम्म के हाती।

भीम के हाथी। ऐसा आदमी जिसका कहीं ठिकाना न लगे। जनश्रुति है कि महाभारत के युद्ध में भीम ने शत्रुओं की सेना के हाथी पकड़-पकड़ कर आकाश में फेंक दिये थे जो अब भी वहाँ निरुद्देश्य घूम रहे हैं।

भीक छोड़ी, कुत्तन से बचे।

एक हानि हुई, पर दूसरा लाभ तो हुआ।

भींत भीतरी, कुआ बायरो।

घर की दीवाल भीतर की ओर दबी हुई और कुएँ का घेरा बाहर की ओर फैला हुआ होना चाहिए। इससे वे मजबूत रहते हैं।

भींत लैकें चितेउर करत।

दीवाल हाथ में लेकर चित्रकारी करते हैं। अनहोनी या असंभव काम करना।

भुस में अँगरा डार, मलंगो दूर भई।

दो आदमियों में लड़ाई-झगड़ा करा कर अलग हो जानेवाले के लिए।

भूँकें बेर, अघाने पोंड़ा।

बेर भोजन के पूर्व और गन्ना भोजन के बाद सेवन करना चाहिए।

भूँके भगत न होय गुपाला। / भूँजी मछरी दौ में परी।

भूँनी हुई मछली पानी में गिर गयी। हाथ में आयी चीज निकल गयी।