यशश्शेष पं. बलराम न्यायाचार्य का जन्म ग्राम हिलगन (ढाना) जिला सागर में सन् 1908 ई. में पारम्पारिक पुराणवाचक पं. रामप्रसादचौबे के घर हुआ। अल्पवय में माता-पिता के कालकवलित हो जाने पर बलरामजी एवं छोटे भाई हरभजन जी सागर आ गए। सागर के ब्रह्मचर्याश्रम, धर्मश्री में रहने लगे। बलरामजी प्रथमा तक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् कोलकाता प्रस्थान कर गए। हरभजन जी सन्तों की टोली के साथ प्रयागराज चले गए।
सौभाग्यवशात् कोलकाता में बलरामजी को प्रख्यात न्यायाचार्य पं. फणिभूषण भट्टाचार्य ने अपने निवास में ही आश्रय प्रदान किया। उन्हें परिवार के सदस्य का ही दर्जा प्रदान किया ।गुरु माँ ने उन्हें कभी भी अपने माता-पिता की कमी अनुभव नहीं होने दी। शीघ्र ही किशोरवय बलराम ने बंगाली ब्राह्मण परम्पराओं तथा बांग्ला भाषा को सीख लिया। इसके बाण पश्चात् इनकी मध्यमा तक कि शिक्षा कोलकाता में ही हुयी। गुरुजी को राजकीय कॉलेज, वाराणसी से अध्यापन हेतु बुलावा प्राप्त हुआ। सारे गुरु परिवार के साथ बलरामजी भी वाराणसी आ गये। यहाँ गुरुकृपा से आपने अल्पकाल में ही व्याकरण, वेद-वेदान्त एवं न्यायशास्त्र का अध्ययन किया। वाराणसी में आप तत्काल के सबसे कम वय के न्यायाचार्य उत्तीर्ण हुये। गुरुजी के आदेश पर 1937 में आप बड़ोदा कॉलेज (वर्तमान में महाराज सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा) में संस्कृत एवं दर्शन के आचार्य नियुक्त वे हुये। यहाँ आपने 8 वर्ष तक अध्यापन कार्य किया, संस्कृत,गुजराती, मराठी, बांग्ला एवं अँग्रेजी माध्यमों से आपको अध्यापन का अनुभव था। आप हिन्दुस्तानी सङ्गीत के भी निष्णात जानकर थे। सुचारू अध्यापन काल के दौरान आपकी पत्नी का 1944 में असमय देहान्त हो जाने के कारण आपका मन अत्यन्त खिन्न हो गया। बड़ोदा स्टेट के तत्कालीन महाराजा एवं राजकुमार के बार-बार आग्रह करने के बावजूद आपने अध्यापन कार्य से त्यागपत्र दे दिया। आप बड़ोदा से चलकर सागर आये यहाँ उनके छोटे भाई हरभजनदास जी वृन्दावन बाग मठ के महन्त हो गये थे । मठ के प्रबन्धन के लिए उन्हें एक कुशल प्रशासक की आवश्यकता थी। उन्होंने बलरामजी से निवेदन किया कि वैराग्य भाव छोड़ें तथा ठाकुरजी के मठ को व्यवस्थित करें और जब समय मिले तब सागर के विद्वानों का शास्त्रों में मार्गदर्शन करें। अस्तु, इन्होंने मठ की व्यवस्था को सुचारू बनाया, कई न्यायालयीन प्रकरणों का निबटान कराया। मठ की सम्पत्तियों का कब्जा प्राप्त किया। बीच बीच में पं. प्रेमनारायण द्विवेदी प्रभृति आचार्यों को आपने न्यायशास्त्र पढ़ाया। आप सदैव सागर नगर के उस काल के कोटि के संस्कृत विद्वानों यथा पं. गोविन्द शास्त्री, पं.जगन्नाथ त्रिपाठी, पं. हृषीकेश उपाध्याय, पं. जीवन लालजी अग्निहोत्री, पं.बलराम नागार्च, पं. शम्भु दयाल पाण्डेय आदि से घिरे रहते थे। आपने न्यायशास्त्र पर 'नव्य न्याय विमर्श ' ग्रन्थ का भी सृजन किया था। जिसकी पाण्डुलिपि उनके जीवनकाल में वृन्दावन बाग़ मठ में उपलब्ध थी। उसके प्रकाशन की वे चर्चा करते रहते थे। किन्तु 1982 में वे ब्रह्मलीन हो गये। अस्तु, उनके द्वारा सृजित ग्रन्थ अप्रकाशित रह गया।