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पं. बट्टू लाल पाठक

आपका जन्म बेगमगंज के प्रतिष्ठित भार्गव ब्राह्मण परिवार में पं. बद्रीनाथ पाठक के घर 1854 में हुआ। आपने अपने पिता से ही संस्कृत की समस्त शिक्षा प्राप्त की। इन्होंने कभी किसी स्कूल/पाठशाला में प्रवेश नहीं लिया। स्वाध्याय तथा पिताजी से प्राप्त मार्गदर्शन से आपने संस्कृत साहित्य, व्याकरण तथा ज्योतिष में निपुणता प्राप्त की। सागर नगर की शनीचरी टौरी पर आपका विवाह हुआ। इसके बाद ये परकोटा सागर स्थित चित्रगुप्त मन्दिर में रहकर ब्राह्मण बालकों को संस्कृत शिक्षा प्रदान करने लगे। मन्दिर के बाजू में इन्होंने पाठशाला तथा ज्योतिष अनुसन्धान केन्द्र स्थापित किया और जीवन के अंतिम दिनों तक विद्यार्थियों को संस्कृत और ज्योतिष पढ़ाते रहे। उल्लेखनीय बात यह है कि इनके पढ़ाये हुये विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त कर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जैसे शीर्ष संस्थान में प्रोफेसर बने। इनको 2 पुत्र तथा 2 पुत्रियों के रूप में 4 संतानें प्राप्त हुईं। इनमें से पं. काशीनाथ जी पाठक सुयोग्य कर्मकाण्डी विद्वान हुए। इनके पुत्रवत् शिष्य पं. दामोदार तिवारी (97 वर्षीय) सागर के तिरुपतिपुरम में निवासरत हैं। पं. बट्टू लालजी की चतुर्थ पीढ़ी के सदस्य पं.जागेश्वर नाथ पाठक आचरण समाचार पत्र में कार्यरत हैं। ध्यातव्य है कि पं. बट्टू लालजी सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. सुरेश आचार्य के परनाना थे। सागर की जानीमानी हस्तियाँ यथा पं. आनन्द मङ्गल मिश्र, पं. उमाशंकर मिश्र तत्कालीन सत्र न्यायाधीश और नगर सेठ भैरो बख्श इनके अनुयायी रहे। पाठक जी प्रतिदिन पंचगव्य लेते थे, सूर्योदय के पूर्व तालाब में गले तक जल में खड़े रहकर नवग्रहों का जप करते। इसके बाद घाट पर स्थित शिव मंदिर में शिवार्चन करते । इतना कर लेने के बाद ही किसी से बोलते थे। इनके द्वारा निर्मित 'सागर दिवाकर' नामक पंचांग वाराणसी से प्रकाशित होता था। यह पंचांग सम्पूर्ण महाकौशल क्षेत्र में प्रचलित था। वर्ष 1922 में इस पंचांग का प्रकाशन बंद हो गया।

इनकी ज्योतिषीय गणना इतनी सटीक होती थी कि कई लोगों की मृत्युतिथि की गणना, चोर और चोरी गये माल की स्थिति की जानकारी भी सत्य सिद्ध हुई। इस कारण पुलिसकर्मी भी गुप्त रूप से इनके संपर्क में रहते थे। श्री पजन सिंह ठाकुर नामक सज्जन पं. पाठक की किसी भविष्य वाणी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने गऊघाट पर एक शिवजी का मन्दिर बनवाया तथा पाठक जी को दान कर दिया। मन्दिर की देखरेख तथा पूजा पाठक जी के मार्गदर्शन में होती थी। पाठक जी के ज्योतिष अनुसन्धान केन्द्र में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की निवास तथा भोजनादि की व्यवस्थायें यहीं होती थीं। पण्डित जी संस्था में कई विद्यार्थी रखते थे, सभी अध्ययन के साथ साथ पाण्डित्य कर्म भी करते थे। इससे प्राप्त आय से संस्था संचालित होती रही। पण्डित जी जेल के कैदियों को भी 5 रु.मासिक वृत्ति पर उपदेश प्रदान करते थे। सागर के कई वरिष्ठ कर्मकाण्डी विद्वान जैसे पं. हृषिकेश उपाध्याय इनके शिष्य रहे। सागर नगर के अनेक सेठों ने पाठशाला हेतु आर्थिक सहयोग किया। आपने वर्ष 1944 में ऋषि पञ्चमी को सन्ध्या 4 बजे सभी विद्यार्थियों को एकत्रित किया, फिर शंख, झालर बजवाना प्रारम्भ करवाया और अपनी पूर्व घोषणा के अनुसार ठीक 5 बजे दिव्य ज्योति में विलीन हो गए ।

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