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पं. किशोरी लाल शास्त्री

ज्योतिष मार्तंड पंडित किशोरी लाल शास्त्री का इनका जन्म 05. 10. 1897 को ग्राम खमरिया, तहसील रहली, जिला सागर में एक सरयू पारीण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। ये सरस्वती वाचनालय सागर के अध्यक्ष पंडित शुकदेव प्रसाद तिवारी के मामा थे। वे सन 1930 में काशी विद्यापीठ से शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण कर झांसी आ गए। उस समय झांसी के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी और धनाढ्य लोगों को संस्कृत पढ़ाने के लिए एक योग्य अध्यापक की तलाश थी। इन्हीं लोगों ने बनारस जाकर किसी विद्वान शिक्षक की जानकारी ली। बनारस के विद्वानों ने उनके नाम का सुझाव दिया और सभी झांसी वासियों के आग्रह पर वे झांसी आ गए।

झांसी के बड़ा बाजार स्थित मुरली मनोहर मंदिर में इनको रहने के लिए पर्याप्त स्थान दिया गया और इसी मंदिर में जीवन पर्यंत सपरिवार निवास करते रहे। अध्यापन कार्य करते-करते संपूर्ण बुंदेलखंड में उनकी ख्याति फैल गई। शहर में आयोजित बड़े-बड़े धार्मिक कार्यों में उनकी उपस्थिति अनिवार्य रूप से होती थी। उन्होंने झांसी के पंडितों को व्याकरण, संस्कृत और कर्मकांड की शिक्षा दी। इनका विवाह झांसी में ही पंडित रामदयाल पांडेय की पुत्री रामाबाई के साथ संपन्न हुआ। इनकी आठ संतानें हुईं। सभी संतान संस्कृतज्ञ हुई। संस्कृत के उत्थान के लिए इन्होंने 1963 में श्री बुंदेलखंड विद्वत परिषद का गठन किया जिसके माध्यम से हिंदू त्यौहार, तिथियों आदि की विस्तृत जानकारी के लिए एक पत्रिका का प्रकाशन किया गया। इसके बाद शास्त्रीय माला प्रकाशन के नाम से एक संस्था शुरू की जिसके माध्यम से संस्कृत ग्रंथों का प्रकाशन होने लगा। इनके द्वारा रचित तीन ग्रंथ प्रकाशित भी हुए। वे थे - श्रीकृष्णमाचार्य महात्मा, श्रीदुर्गासप्तशती विवेचन, और तीसरा ग्रंथ श्रीचतुर्वर्ग साधन । उनकी कुछ अन्य रचनाएं हस्तलिखित हैं जो प्रकाशित नहीं हो सकीं।

उन्होंने अपने पूरे जीवन काल में संस्कृत भाषा के उत्थान और समाज में उसके प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य किया। वे पंडितों के मन में उठी हर समस्या का समाधान वेद और पुराणों के उद्धरण देकर किया करते थे। उनका पंचांग झांसी में प्रमुख रूप से मान्य था । ज्योतिष विषयक उनकी भविष्यवाणियां शत प्रतिशत सही रहती थीं। झांसी के लोग इन्हें ज्योतिष मार्तंड के नाम से पुकारते थे। दिनांक 16.11.1992 को इन्होंने नश्वर शरीर त्याग दिया। उनके पुत्र प्रत्येक वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर सम्मान समारोह का आयोजन करते हैं। वर्ष 2018 में उनकी स्मृति में एक स्मारिका का प्रकाशन किया गया था।

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