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प्रो. नारायण शंकर शुक्ल

प्रोफेसर शुक्ल का जन्म सागर शहर के बरिया घाट वार्ड (चकरा घाट) में सन 1934 में खेड़ावाल गुजराती ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पिता पंडित रवि शंकर शुक्ल पाण्डित्य कार्य करते थे। पांच भाइयों में से यह चौथे नंबर के थे। बचपन से ही अन्तर्मुखी स्वभाव वाले शुक्ल जी हमेशा अध्यनरत रहते थे। शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला से मैट्रिक परीक्षा पास कर सागर विश्वविद्यालय में अध्ययन करने लगे। यहीं से इन्होंने संस्कृत में एम. ए. की उपाधि प्राप्त की। यह सम्भवतः शुरुआती बैच के छात्र रहे हैं। ये पीएच.डी. करने उज्जैन चले गए । सागर से जाने के बाद इनका सागर से संबंध लगभग न्यून ही रहा। माता-पिता से मिलने कभी कभार अल्प समय के प्रवास पर ही आते जाते रहे जिससे सागर वासियों से उनका परिचय नहीं रहा। उज्जैन से पीएच.डी. प्राप्त करने के पश्चात् वे ग्वालियर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर अध्यापन कार्य करने लगे। लगभग 5 वर्ष के पश्चात इनका चयन दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवाचक के पद पर हो गया। जुलाई 1964 में उनका विवाह सिवनी निवासी श्रीमती विमला के साथ संपन्न हुआ। उनकी पत्नी श्रीमती विमला एमबीबीएस डॉक्टर हैं। इसी बीच इन्हें पेरिस में फ्रेंच गवर्नमेंट स्कॉलरशिप योजना के अंतर्गत स्कॉलरशिप प्राप्त हुई। नवंबर 1964 में यह पेरिस चले गए और वहां सोरबोन यूनिवर्सिटी से इन्होंने डी. लिट्. की उपाधि प्राप्त की। यह अपने आप में उनकी बड़ी उपलब्धि रही। 1970 से 1980 तक तेहरान विश्वविद्यालय, ईरान में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रहे। इसी दौरान इन्होंने रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य का पर्शियन भाषा में अनुवाद किया। उनके कई शोध पत्र प्रकाशित हुए। 1980 में यह पुनः दिल्ली विश्वविद्यालय में आ गए और 1994 में दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रोफेसर पद से सेवानिवृत हुए। गृह नगर वापसी की चाह में 1982 में इन्होंने सागर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में प्रोफेसर पद पर नियुक्ति हेतु साक्षात्कार भी दिया था। इन्हें हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, गुजराती, फ्रेंच और पर्शियन भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। उन्होंने कश्मीरी पंडित क्षेमेन्द्र पर दो ग्रंथ लिखे जो अंग्रेजी भाषा में हैं । 'कल्चरल ट्रेंड्स इन कश्मीर एंड क्षेमेन्द्र' को संस्कृत जगत में ख्याति प्राप्त हुई। उनके निर्देशन में पांच विद्यार्थियों ने पीएच.डी. तथा एक विद्यार्थी ने एम.फिल. की उपाधियां प्राप्त कीं। गार्गी कॉलेज की प्रोफ़ेसर श्रीमती वेदवती वैदिक इनकी शोध छात्रा रहीं। उनकी दो संतान हुईं। पुत्र अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, पुत्री श्रीमती रश्मि शुक्ला आइ पी एस अधिकारी बनीं। वर्तमान में वे भी अमेरिका में हैं। शुक्ल जी के पूर्वज भी अच्छे पंडित रहे हैं। वसंत विहार निवासी उनकी भतीजी श्रीमती आभा सेलट (सेवानिवृत्त प्राचार्य) ने उनके पूर्वजों के समस्त पांडुलिपि ग्रंथ 2005 में संस्कृत विभाग को भेंट कर दिये। उनके बड़े भाई गौरी शंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के विधि विभाग में प्रोफेसर रहे। बरिया घाट वार्ड की हनुमान गली में इनका पैतृक निवास आज भी है। फरवरी 2017 में इनका निधन हो गया। विदेश से संस्कृत में डी. लिट्. उपाधि प्राप्त करने वाले सागर के ये इकलौते व्यक्ति हैं।

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