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डॉ. पन्नालाल जैन

सागर जिले के पारगुंवा नामक गाँव में एक गरीब परिवार में 05 मार्च 1911 को इनका जन्म हुआ। पिता श्री गल्ली लाल जैन और माता का नाम श्रीमती जानकी बाई था। पंडित जी की प्रारम्भिक शिक्षा एक वृक्ष के नीचे से प्रारम्भ हुई। उस समय गाँव में कोई पाठशाला नहीं थी। श्री दशरथ लाल पुजारी शिक्षा प्रदान करते थे ।7-8 वर्ष की आयु में ही इनके पिता तथा गाँव के अन्यान्य बुजुर्ग लाल बुखार नामक बीमारी की भेंट चढ़ गये। असहाय अवस्था में इनकी माताजी अपने भाई कुन्दन लाल भड्डर के पास आ गयीं। उन्हीं ने पूरे परिवार के लालन पालन तथा शिक्षा का समुचित प्रबन्ध किया ।

ये सागर में गणेश प्रसार वर्णी जी से संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने लगे। इन्होंने जैन धर्म और संस्कृत का गहन अध्ययन कर शास्त्री, काव्यतीर्थ और साहित्याचार्य की परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं । इसके पश्चात् सागर वि. वि. से प्रो. रामजी उपाध्याय के निर्देशन में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। 1931 में इनका विवाह गढ़ाकोटा निवासी काशीराम जैन की पुत्री श्रीमती सुन्दर बाई के साथ सम्पन्न हुआ। इनके लेखन कार्य में इनकी पत्नी का विशेष सहयोग रहा ।

डॉ. पन्नालाल जी श्रीगणेश दिगम्बर जैन संस्कृत महाविद्यालय में 1931 से 1983 तक प्राचार्य पद पर सेवारत रहे। इन्होंने महाविद्यालय की अनेक व्यवस्थाएं सुचारु रूप से चलायीं, विशेष रूप से होस्टल, भोजन आदि की। 1986 से 2000 तव पिसनहारी की मढिया स्थित संस्कृत महाविघालय में मानद निदेशक के पद पर अपनी निशुल्क सेवायें प्रदान कीं। कटरा मस्जिद से लेकर नमक मण्डी तक का मार्ग शासन ने इनके नाम से घोषित किया। वहीं पर इनकी प्रस्तर मूर्ति प्रतिष्ठित है।

इन्होनें 19 ग्रन्थों की रचना की तथा 74 संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद और सम्पादन किया। इनकी रचनाओं पर अनेक पीएच. डी. हुई और अभी भी भारत के कुछ स्थानों में शोध कार्य चल रहा है। इनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता थी स्वच्छ धोती, खादी की टोपी, कुर्ता, ऊँची कद काटी और मुस्कान भरा चेहरा। इन्हें महावीर पुरस्कार, श्रीगणेशवर्णी पुरस्कार आदि अनेक पुरस्कार प्राप्त हुये। 1969 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा इन्हें आदर्श राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान से नवाजा गया ।

संस्कृत विभाग की विदुषी आचार्या श्रीमती किरण आर्या ने इन पर पन्नालालीयम् नामक लघु काव्य संस्कृत भाषा में लिखा है जो अद्भुत है। पन्नालाल जी के पुत्र डॉ राजेश जैन समय समय पर उन की स्मृति में कार्यक्रम करते हैं। 09.02.2001 को इस महामनीषी ने संस्कृत की सेवा करते हुये अपना शरीर त्याग दिया।

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