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पं. प्रेमनारायण द्विवेदी

सागर नगर की महान् साहित्यिक विभूतियों में पं. प्रेमनारायण द्विवेदी अग्रगण्य हैं। सागर में 5 जून 1922 को पं. परमानंद द्विवेदी के घर में जन्मे द्विवेदी जी का प्राथमिक अध्ययन सागर की चकराघाट संस्कृत पाठशाला से प्रारंभ हुआ। उन्होंने वाराणसी से संस्कृत का परंपरागत अध्ययन कर साहित्याचार्य तक उपाधियां प्राप्त कीं। इसी दौरान वे स्वामी करपात्री जी जैसी विभूतियों के संपर्क में भी आए। उन्होंने विभिन्न शास्त्रों का ज्ञान पारंगत गुरुओं के निर्देशन में प्राप्त किया।

घर लौटकर सागर विश्वविद्यालय से पुनः आधुनिक पद्धति से बी.ए., एम.ए. उपाधियां प्राप्त कर डॉ. वनमाला भवालकर के निर्देशन में 'वैष्णव पुराणों में आचार समीक्षा' पर पीएचडी उपाधि प्राप्त की। उन्होंने शासकीय विद्यालय में अध्यापन एवं पुरोहित कार्य को आजीविका के रूप में चुना। 1980 में सेवानिवृत होकर सागर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में शास्त्र चूड़ामणि के रूप में अध्यापन किया। बाद में भारतीय दर्शन बृहत् कोष के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे श्रीदेव वृंदावन बाग मठ में प्राचार्य भी रहे। इनके द्वारा भेजे गए शुभकामना पत्रों को सहर्ष स्वीकार कर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तथा मोरारजी देसाई ने हस्तलिखित पत्र आपको भेजे। आजीवन सारस्वत साधना करने वाले द्विवेदी जी की मौलिक एवं अनूदित रचनाएं लगभग 21000 श्लोक हैं। जो संस्कृत अनुवाद के क्षेत्र में सर्वाधिक हैं। अनुवाद में उनकी विशेष दक्षता एवं सहज रुचि रही । उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस का सरल, सरस और रोचक संस्कृत काव्य अनुवाद किया जिसमें 7814 पद्य हैं। इसे साहित्य अकादमी दिल्ली का अनुवाद पुरस्कार प्राप्त हुआ। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली से उनके चार ग्रंथ प्रकाशित हुए। काव्यसंग्रह में देवताओं की भावपूर्ण स्तुतियां, बुंदेली लोकगीतों के संस्कृत अनुवाद हैं। उन्होंने संतवाणी और बिहारी की श्रृंगारिक रचना बिहारी सतसई का भी पद्यानुवाद सरस संस्कृत भाषा में किया। तुलसीदास तथा सूरदास के कई काव्यों का अनुवाद तुलसीसूरसंग्रह में है। जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कृति आंसू का संस्कृत अनुवाद अत्यंत लोक प्रिय हुआ।

उन्होंने रहीम, कबीर, मीरा, पद्माकर, महादेवी वर्मा, रसखान, सुकरात, एमरसन आदि की कविताओं का संस्कृत पद्य अनुवाद किया। कुछ रचनाएँ अभी प्रकाशित हैं। उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं तथा संस्कृत सेवा के लिए 2005 में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनकी रचनाओं पर सागर विश्वविद्यालय से प्रो. कुसुम भूरिया के निर्देशन में डॉ. ऋषभ भारद्वाज ने पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की और उनकी रचनाओं का संपादन किया। उनकी रचनाओं पर उज्जैन, भोपाल, तिरुपति विश्वविद्यालयों में भी शोध कार्य संपन्न हुए हैं ।

भक्ति साहित्य के मर्मज्ञ द्विवेदी जी के जीवन पर महापुरुषों की संगति और सत्साहित्य के अध्ययन का गहरा प्रभाव पड़ा। वे अपने मन, वचन और कर्म से शास्त्रीय अचार का पालन करते थे। उनके व्यक्तित्व में भारतीय संस्कारों की गहरी छाप थी। शास्त्र ज्ञान के साथ ही वे तैराकी और मल्ल विद्या में दक्ष थे। धवल वस्त्र, सुदृढ़ काया उनके व्यक्तित्व को उभारती थी। संस्कृत सेवा करते हुए 28 अप्रैल, 2006 को वे ब्रह्मलीन हो गए। उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन होता है। उनके पौत्र श्री सूर्यकांत द्विवेदी (शासकीय संस्कृत शिक्षक ) उनकी परंपरा को संजोए हुए हैं।

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