बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटल संग्रह
बुंदेलखंड विश्वकोश

प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान्

प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी का जन्म मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में 15.02.1949 को संस्कृत प्राध्यापक डॉ. गोकुल प्रसाद त्रिपाठी के घर हुआ। संस्कृत की शिक्षा इन्होंने अपने पिता से घर पर ही प्राप्त की। मात्र 3 वर्ष की आयु में आपकी माताजी का आकस्मिक निधन हो गया जिससे बचपन में कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ा। बचपन से ही पढ़ाई में अत्यधिक लगन थी। इन्होंने मात्र 6 वर्ष की आयु में ही पहली मौलिक रचना लिखी। राजगढ़ से हायर सेकेंडरी की परीक्षा उत्तीर्ण की और मेरिट में स्थान प्राप्त किया। महाराजा कॉलेज छतरपुर से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। उसी कॉलेज के किसी कार्यक्रम में आचार्य रामजी उपाध्याय ने इनकी प्रतिभा को पहचान लिया और यह कहकर कि 'तुम्हारा भविष्य संस्कृत में उज्ज्वल है' सागर विश्वविद्यालय से एम. ए. संस्कृत में प्रवेश को प्रेरित किया। इस प्रकार कॉलेज से विश्वविद्यालय आए। एम. ए. में मेरिट में स्थान प्राप्त कर स्वर्ण पदक प्राप्त किया और पीएच.डी. के साथ-साथ यहीं अस्थाई व्याख्याता के रूप में पढ़ाने लगे।

आचार्य रामजी उपाध्याय के निर्देशन में उत्कृष्ट शोध कार्य कर 1972 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। बाद में डी.लिट् की उपाधि भी प्राप्त की। तभी उदयपुर विश्वविद्यालय में व्याख्याता के पद पर स्थाई नियुक्ति हो गई। 1973 में पुनः सागर विश्वविद्यालय में व्याख्याता के पद पर नियुक्त हुए, 1978 में उपाचार्य और 1982 में प्रोफेसर के पद पर चयनित हुए। मात्र 33 वर्ष की आयु में प्रोफेसर बनने वाले यह भारत के पहले विद्वान हैं। 1974 में इनका विवाह एम. ए. हिंदी में स्वर्ण पदक प्राप्त सत्यवती त्रिपाठी से हुआ। इनकी तीन पुत्रियां हैं जिनमें से दो विदेश में डॉक्टर और इंजीनियर हैं। आचार्य त्रिपाठी जी ने 25 वर्ष की आयु में ही विद्वानों के बीच अपनी पहचान बना ली थी। आपने 1983 में पहली बार शैक्षणिक विदेश यात्रा की और अब तक लगभग 20 देशों की यात्रा कर चुके हैं।

3 वर्ष तक थाईलैंड के शिल्पाकॉर्न विश्वविद्यालय में, कुछ समय कोलंबिया विश्वविद्यालय न्यूयॉर्क में अतिथि आचार्य रहे। लगभग 200 ग्रंथों के प्रणेता त्रिपाठी जी को 50 से अधिक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं जिनमें साहित्य अकादमी और राष्ट्रपति पुरस्कार उल्लेखनीय हैं। इनके शोध निर्देशन में 38 लोगों ने पीएच.डी. और एक शोधार्थी ने डी. लिट. की उपाधि प्राप्त की है। इन्हें हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, जर्मन और थाई भाषाओं का पर्याप्त ज्ञान है। नाट्य परिषद् आदि संस्थाओं की स्थापना की है । सागरिका नाट्यम सहित कई पत्रिकाओं का संपादन किया। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हमेशा हर छात्र को सहयोग देकर उसका भविष्य बनाने की दिशा में कार्य करते रहे हैं । संस्कृत विभाग का पुस्तकालय और पांडुलिपि विभाग इन्हीं के परिश्रम का परिणाम है। इनके कई शिष्य महाविद्यालयों और विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य कर रहे हैं 15 वर्ष तक केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली में कुलपति रहे और आंशिक समय के लिए सागर विश्वविद्यालय तथा लाल बहादुर शास्त्री विश्वविद्यालय दिल्ली में कुलपति रहे। इन्होंने कई राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठियों में अध्यक्षता की है।

ये यूट्यूब पर लगभग प्रतिदिन व्याख्यान प्रसारित करते हैं जो अत्यंत लोकप्रिय हैं। इनकी कृतियों पर देश भर में शोध कार्य हो चुके हैं और चल रहे हैं । इन पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठियों का आयोजन हो चुका है तथा कई पत्रिकाओं के विशेष अंकों का प्रकाशन हुआ है। 1983 से कई विश्वविद्यालय में अध्यापकों के चयन हेतु इन्हें आमंत्रित किया जाता रहा है। ये सेवानिवृत्ति के पश्चात अब उज्जैन में स्थाई रूप से निवासरत हैं।

मेँ (डॉ. राम रतन पांडेय) ने 1973 से लेकर 1990 तक गुरुवर से बी ए. एम ए. पीएच.डी. और डी. लिट. की शिक्षा प्राप्त की है उनके निर्देशन में पीएच.डी. हेतु पंजीकृत प्रथम छात्र (अगस्त 1976) और डी. लिट. करने वाला एकमात्र छात्र हूँ। गुरुवर को प्रणाम !!!

क्या इस लेख में कोई त्रुटि है?