इनका जन्म 14 नवंबर 1889 को रामपुरा वार्ड निवासी भार्गव ब्राह्मण पंडित नन्दी लाल पौराणिक के यहां हुआ। उनकी प्राथमिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला चकरा घाट से प्रारंभ हुई फिर बनारस से शास्त्री की परीक्षा और कोलकाता से दर्शनशास्त्र में आचार्य की उपाधि प्राप्त की । उड़ीसा के पं. महादेव भट्ट से वेद की शिक्षा प्राप्त की उस समय महादेव भट्ट भारत के गिने-चुने वेद विद्वानों में से एक थे । इस प्रकार समस्त शिक्षा प्राप्त कर सागर में धर्मश्री पाठशाला में अध्यापक हो गए। सागर के बड़े- बड़े विद्वानों ने इनसे वेद की शिक्षा प्राप्त की । उस समय की शास्त्रार्थ परंपरा में यह बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। उनकी ग्रंथ कंठस्थ करने की अद्भुत क्षमता थी। एक बार उनकी विद्वत्ता से गद्गद होकर ग्वालियर राजा के जीवाजी राव सिंधिया ने एक चांदी का सिक्का और पत्राकार वाल्मीकि रामायण भेंट की जो आज भी उनके पुत्र के. के. सिलाकारी पास के सुरक्षित है।
दिसंबर 1933 में महात्मा गांधी सागर आए। उनको कहीं से जानकारी मिली कि सागर में कोई सस्वर वेदपाठी पंडित हैं । गांधी जी उनसे मिलकर बहुत खुश हुए । अपने साथ वर्धा आश्रम ले गए। गांधी जी ने पूछा कि हरिजन के प्रति भेदभाव के बारे में आपका वेद क्या कहता है ? तब सिलाकारी जी ने वेदों का संदर्भ देकर बताया कि वेदों में किसी प्रकार का जातिगत भेदभाव कहीं है ही नहीं। गांधी जी इससे और उनके ज्ञान से बहुत प्रभावित हुए ।
उन्होंने अपना पूरा जीवन सागर के पंडितों को अपने घर से ही वेद और कर्मकांड की शिक्षा प्रदान करने में लगाया । यद्यपि वे वाचिक परंपरा के पंडित थे । इसलिए लेखन से दूर रहकर पंडित गोविंद प्रसाद शास्त्री जैसे विद्वानों को शिक्षित किया। वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ चकरा घाट वार्ड के कई बार मेंबर रहे । उनके भाई डॉ. लोकनाथ सिलाकारी सागर विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर रहे । एक बार द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी शांतानंद ने उनकी विद्वत्ता से प्रसन्न होकर विद्या वाचस्पति के रूप में सम्मानित किया। उनके पांच संतान हुईं। वकील पं. के के सिलाकारी उनके पुत्र हैं जो कि संस्कृत पाठशाला धर्मश्री में अध्यक्ष हैं। 95 वर्ष की आयु में8 मई 1984 को सस्वर वेदपाठी पंडित सिलाकारी का स्वर्गवास हो गया।