प्रो. रामजी उपाध्याय का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के मलैजी नामक गाँव में 01.07.1920 को हुआ। इनके पिता पं. महावीर उपाध्याय सुसंस्कृत एवं धर्मपरायण शिक्षक थे। इन्होंने बलिया से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण कर वाराणसी के क्वींस कॉलेज से इण्टर तथा इलाहाबाद वि.वि. से बी.ए., एम.ए. और डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की। इनका शोधप्रबन्ध ‘संस्कृत एण्ड प्राकृत महाकाव्याज्' अंग्रेजी भाषा में था। इनके निर्देशक प्रो. बाबूराम सक्सैना थे। ये 1962 में भारत की सांस्कृतिक भूमिका' विषय पर शोधप्रबन्ध प्रस्तुत कर डी.लिट् . की उपाधि प्राप्त करने वाले प्रथम मनीषी रहे हैं। काशी हिन्दू वि.वि. से 1983 में इन्हें डी.लिट्. की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया।
उस समय कई विश्वविद्यालय प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए चयन कर्ता के रूप में उन्हें आमंत्रित किया करते थे।
आचार्य उपाध्याय हमेशा सफेद खादी कुर्ता, धोती और सफेद गाँधी टोपी धारण करते थे। वे विनोदप्रिय, प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी और नियमों के पक्के थे । वे ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सुबह 7 बजे तक अध्ययन और फिर दिन में लेखन करते थे ।
सागर वि.वि. में उनकी नियुक्ति संस्थापक डॉ. हरीसिंह गौर के समय में वे यहां 1947 से 1980 तक कार्यरत थे जिसमें 23 वर्ष विभागाध्यक्ष रहे।
संस्कृत और संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए उन्होंने लेखन और व्याख्यानों के माध्यम से खूब काम किया।
उन्होंने अनेक संस्थाओं की स्थापना की। उनकी 65 पुस्तकें तथा लगभग 100 शोधालेख प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने 40 शोधार्थियों का पीएच.डी. उपाधि हेतु निर्देशन किया।
उनकी दो सन्तान बी एच यू में प्रोफ़ेसर पद से सेवा निवृत्त हुईं। वे हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत तथा प्राकृत भाषा के अच्छे ज्ञाता थे। उनके द्वारा आरम्भ की गई सागरिका पत्रिका ने संस्कृत जगत् में विशिष्ट पहचान बनाई। उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार सहित कई पुरस्कार प्राप्त हुए। वे सेवानिवृत्ति के पश्चात् महामनापुरी, वाराणसी में निवास करने लगे। जीवन के अंतिम समय तक उनका अध्ययन तथा लेखन कार्य अनवरत रूप से चलता रहा । दिनांक 17.01.2011 को इस महामनीषी ने अंतिम सांस ली।