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डॉ. शशिकुमार सिंह

डॉ. शशिकुमार सिंह का जन्म वाराणसी के पास चंदौली जिले के ग्राम कुरहना में 28.07.1974 को स्व. श्री लालजी सिंह के यहां हुआ। इनके पिता शासकीय सेवा में कार्यरत रहे। ये तीन भाई हैं, जिनमें यह सबसे छोटे हैं। इनकी हाई स्कूल तक की शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर, मुगलसराय से हुई। इंटरमीडिएट बंगाली टोला इंटर कॉलेज सोनारपुरा, वाराणसी से हुई। तत्पश्चात बी ए तथा एम ए और पीएचडी की शिक्षा इन्होने काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी से प्राप्त की। सन 2002 में बी एच यू से डॉ. पर्णदत्त सिंह के निर्देशन में सुर्जनचरित महाकाव्य पर शोध कार्य किया। यह महाकाव्य बड़ा विलक्षण काव्य है। इसको पढ़ना जितना सरल है, समझना उतना ही कठिन । इस पर शोध कार्य करना इनकी विलक्षण प्रतिभा को दर्शाता है। इस बीच इन्होंने चार बार यूजीसी नेट परीक्षा उत्तीर्ण की।

हायर सेकेंडरी तक की पढ़ाई इन्होंने विज्ञान समूह से पूरी की। स्नातक करने के पश्चात इन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। उसके लिए कठोर परिश्रम किया, कुछ सफलता प्राप्त हुई लेकिन अंतिम पड़ाव पर सफलता कुछ दूर रह गई। फिर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनने का सपना संजोया, सफल हुए और आज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर्स में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना ली है। सागर नगर में भी ये अत्यंत प्रतिष्ठित संस्कृतज्ञ, प्रभावपूर्ण वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। लोग इनको सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं ।

सन 2004 में इनका विवाह चंदौली जिले के ग्राम कम्हरिया में श्री रमाकांत सिंह की पुत्री नीतू सिंह के साथ संपन्न हुआ । विवाह के बाद श्रीमती नीतू सिंह ने हिंदी में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनकी दो संतान पुत्री संस्कृति और पुत्र सार्थक हैं, दोनों अत्यंत प्रतिभाशाली हैं।

सौम्य व्यवहार और मधुर भाषी डॉ. सिंह संगीत के प्रेमी हैं साथ ही अच्छे जानकार भी हैं। शास्त्रीय संगीत और गजल में आपकी विशेष रुचि है। ये वर्ष 2013 से संस्कृत विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इसके पूर्व इन्होंने नेहरू स्नातकोत्तर महाविद्यालय ललितपुर में 8 वर्ष तथा एक वर्ष तक विनायक महाविद्यालय, अयोध्या में अध्यापन कार्य किया।

इन्होंने तीन पुस्तकों का प्रणयन तथा चार पुस्तकों का संपादन किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनके 30 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। ये पहले संस्कृत विभाग की सागरिका पत्रिका का प्रबंध संपादन तथा वर्तमान में नाट्यम पत्रिका का प्रबंध संपादन कर रहे हैं। संस्कृत भाषा आम जन की बोल-चाल की भाषा बने, इसके लिए विशेष प्रयास समय- समय पर करते रहे हैं। इनके निर्देशन में दो शोधार्थियों ने पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की है तथा चार शोध कार्य कर रहे हैं।

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