डॉ. वनमाला भवालकर का जन्म कर्नाटक के बेलगाँव नामक नगर में 08.02.1914 को हुआ । इनके पिता श्री नारायण राव लोकूर बम्बई हाईकोर्ट के न्यायाधीश होने के साथ ही संस्कृत के अच्छे पंडित और माता श्रीमती लक्ष्मी बाई लोकूर उत्तम गृहिणी थीं। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा कर्नाटक में ही सम्पन्न हुई। 14 वर्ष की आयु में इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। मुम्बई वि.वि. से प्रथम श्रेणी में स्नातक तथा कलकत्ता वि.वि. से 1937 में प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति में एम. ए. प्रथम श्रेणी में सर्वप्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण की। नागपुर वि.वि. से 1952 में संस्कृत में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। 1961 में सागर वि.वि. से 'महाभारत में नारी' विषय पर पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की।
एक वर्ष तक गोखले मेमोरियल कॉलेज कलकत्ता में अध्यापन करने के पश्चात् 1945-46 में पूना के एस.पी. कॉलेज में अध्यापन किया। ये 1946 में सागर वि.वि. के स्थापना वर्ष में नियुक्त होने वाली म. प्र. की संस्कृत की प्रथम महिला प्राध्यापक थीं। ये 1976 में सेवानिवृत हुईं। सेवा निवृत्ति के पश्चात् इनकी सेवा अवधि दो वर्ष तक बढ़ा दी गयी थी ।
1935 में इनका विवाह प्रो. डी. आर. भवालकर के साथ सम्पन्न हुआ। इनके पति सागर वि.वि. में भौतिकशास्त्र विभाग के अध्यक्ष रहे। इनकी तीन पुत्रियां डॉ. मीना पिम्पलापुरे (वरिष्ठ समाज सेविका, सागर), श्रीमती लेखा, श्रीमती अरुणा नावलीकर और दो पुत्र श्री दिलीप भवालकर (केट के निदेशक) और श्री प्रदीप भवालकर हैं। 1948 से 1970 तक सागर वि.वि. के महिला छात्रावास की पहली महिला वार्डन भी रहीं तथा सागर नगर और विश्वविद्यालय में अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का कुशल संचालन किया। वे छात्र छात्राओं व कनिष्ठ सहायोगियों के बीच 'काकू' के पारिवारिक सम्बोधन से पुकारी जाती थीं। हिन्दी में इनका 'उधार का पति' नाटक अत्यन्त लोकप्रिय हुआ और की प्रस्तुति सागर, भोपाल, इन्दौर और कालिदास समारोह उज्जैन में अनेक स्थानों पर खेला गया। इनकी नृत्य नाटिका 'पार्वतीपरमेश्वरीयम' अनेकों बार हुई। इनके रामवनगमनम्, शाकुन्तलसंगीतिका, दीपदानम्, पाददण्डम् आदि नाट्यकृतियों की भी अनेक प्रस्तुतियां हुई। इनकी एक अन्य शोधकृति ‘पञ्च महाकाव्येषु चन्द्रः ' भी है। उनका संस्कृत के अलावा हिन्दी, मराठी, कन्नड़, जर्मन तथा अंग्रेजी भाषा पर अच्छा अधिकार था। इनका साहित्य अपनी सम्पन्नता में अतुलनीय है। इन्हें म.प्र. तथा उ.प्र. शासन द्वारा कई पुरस्कार प्राप्त हुए तथा 'संसारीचा सरीपाट' नामक नाट्यकृति पर मध्यप्रान्त शासन द्वारा पुरस्कार तथा श्रेष्ठ महिला लेखिका हेतु तिरुमलाम्बापुरस्कार 1993 में प्राप्त हुआ। सारनाथ स्थित तिब्बतीय संस्थान में शिक्षक प्रो. कामेश्वरनाथ मिश्र, राष्ट्रपति पुरस्कृत पं. प्रेमनारायण द्विवेदी प्रो. ओम प्रकाश हर्ष इत्यादि इनके शिष्य रहे हैं।
सागर वि.वि. से सेवानिवृत्ति के पश्चात् इन्होंने अपने निजी संस्कृत ग्रन्थ सदुपयोग हेतु अपने शिष्य प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी को दे दिये। 1967 से 1972 तक केन्द्रीय विद्यालय सागर की चयन समिति की ये सदस्या रहीं। इनके साहित्यिक योगदान पर डॉ. देवेन्द्र तिवारी ने सागर वि.वि. से शोधकार्य किया है।
स्वच्छता, बागवानी, ज्योतिष, योग और संगीत में इनकी विशेष रुचि रही। जीवन के नवें दशक में इन्हें रोगों ने घेर लिया। इन्दौर में अपने पुत्र के पास रहते हुए 30.07.2003 को ये दिव्य ज्योति में विलीन हो गयीं।