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अक्षर: छ

अक्षर 'छ' से शुरू होने वाली कहावतें

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छछूँदर1 छोड़ बो।

(1--एक छोटी आतिशबाजी जो आग लगने पर बहुत तेज चक्कर काटती हुई जमीन पर भागती है।) ऐसी बात कह देना जिससे दो आदमियों में बैठे-ठाले झगड़ा हो जाय।

छटी को लिखो नई मिटत।

भाग्य का लिखा नहीं मिटता।

छटी कौ खाव-पिओ सब निकर गओ।

छटी का खाया-पिया सब निकल गया। बड़ा परिश्रम करना पड़ा। छठी का दूध याद आ गया।

छठ कौ सातें करें फिरत।

छठ की सातें किये फिरते हैं। अनियमित काम करते हैं।

छठपती, घटे पाप, बढ़े रती।

छींक आना, कुछ विशेष अवस्थाओं में, अशुभ मानते हैं। अतः किसी के छींकने पर छींक के दोष को दूर करने के लिए कहते हैं।

छप्पन टका।

बड़ी रकम। व्‍यंग्‍य में।

छाती के जम।

ऐसा आदमी जो टाले से न टले।

छाती पेरबो।

जानबूझ कर किसी को कष्ट देना।

छाती पै उर्दा (मूंग या कोदों) दरबो।

किसी के सामने ही ऐसा काम करना जिससे उसका जी दुखे।

छाती पै कोऊ नई धर देअ (ए)।

धन-दौलत कोई साथ नहीं रख देगा।

छाती पै धर के कोऊ नहीं लै जात।

धन के लिए कहते हैं कि जब तक जीवन है तब तक धन है।

छाती पै पथरा धर लओ।

दुःख सहने के लिए हृदय को कड़ा कर लिया।

छाती पै पथरा धरो।

छाती पर पत्थर रखा है। ऐसा भारी दुःख है जिसे प्रकट नहीं किया जा सकता।

छाती पै वो होरा भूजत।

छाती पर होला भूनते हैं। जानबूझ कर जी दुखाते हैं।

छिगुरी पकर के कौंचा पकरबो।

थोड़ा सहारा पाकर गले पड़ जाना।

छिन सीरे, छिन ताते।

घड़ी-घड़ी में मिजाज बदलना।

छिपनी से समुन्दर उलीचत।

सीपी से समुद्र उलीचते हैं। असंभव कार्य।