अक्षर: ट
अक्षर 'ट' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंटका में टका, ढका में ढका।
पैसे में पैसा आता है, विपत्ति में विपत्ति और बढ़ती है।
टका लगै, चाय टाँची1 बिकाय।
(1-रुपये रखने की लंबी और पतली थैली जो कमर में लपेटी जाती है।) टका खर्च हो, और चाहे टाँची बिक जाय। कुछ भी हो, काम पूरा करके ही छोड़ा जायगा।
टँगपुछिया, उर ओछे कान। हिरन पेटिया लगी मुतान।। / सींग अँगोइया चौंरी छाती। बैल न जानों बेटा हाती।।
ऐसा बैल जिसकी पूँछ टाँगों तक लटकती हो, कान छोटे हों, मूत्रस्थली हिरन की जैसी, पेट से चिपकी हो, सींग आगे को मुड़े हों, और छाती चौड़ी हो, काम करने में हाथी की तरह मजबूत होता है।
टटोबें बेटी अपनो कपार।
बेटी अपना कपाल टटोलती हैं। घर का कोई छोटा आदमी- लड़का या लड़की, जब अपने हाथ से अपना कोई बड़ा अनिष्ट कर लेता है तब दुःख, क्षोभ और व्यंग्य में कहते हैं।
टठिया में खाओ, तौ कई खपरा में खेयें।
थाली में खाओ, तो कहा, खप्पर में खायेंगे। हित की कहने पर कोई उल्टा चले तब।
टठिया हिरात तौ गगरी में हात डारौ जात।
थाली खोने पर गगरी में हाथ डाला जाता है। गरज पड़ने पर ऐसी जगह भी जाना पड़ता है जहाँ से काम पूरा होने की कोई आशा न हो।