अक्षर: भ
अक्षर 'भ' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंभगत तौ भौत बैकुंठ सकरो।
जब किसी जगह लोगों के बैठने के लिए स्थान की कमी हो तब।
भगे भूत की लँगोटी भौत।
जिससे कुछ भी मिलने की आशा न हो उससे थोड़ा भी मिल जाये तो बहुत समझो।
भड़भड़िया अच्छो, पेंट पापी बुरओ।
जिसके पेट में कोई भी बात न रहे वह अच्छा, परन्तु मन में कपट रखनेवाला बुरा।
भय कौ भूत पवन कौ जाड़ौ। जाँ देखौ ताँ ठाँड़ो।
भयभीत व्यक्ति को एकान्त में तेज हवा के चलने से भूत-प्रेत का भय होता है।
भय बिन होय न प्रीत। / भर ज्वानी में माँझा ढीलो।
काम में आलस्य करने वाले नौजवान लड़कों के लिए।
भरत के प्या1 ने प्रान लै लये।
(1-पैली, लगभग दस सेर के नाप का अनाज नापने का बर्तन) कया है, कि राम जब चौदह वर्ष के लिए वन गये तब भरत ने एक बार प्रजा को पैली से नाप-नाग कर अनाज उधार दिया। उसके पश्चात पैली की पेंदी पर जितना अनाज बना उतना ही वापिस लिया। अर्थात दिया तो अधिक और लिया बहुत ही कम। परंतु फिर भी प्रजा को इससे संतोष न हुआ। राम के वन से लौट कर आने पर उनसे शिकायत की कि महाराज, आपकी अनुपस्थिति में हमें और तो सब सुख रहा, परंतु भरत के प्या ने प्राण ले लिये। कहावत का अभिप्राय यह कि कोई कितनी ही भलाई करे फिर भी लोगों को आलोचना का अवसर मिल ही जाता है।
भरम मार, भरम जिवावै।
बात खुल जाने पर आदमी का मरण हो जाता है। और जब तक बात ढकी रहती है, उसकी रक्षा रहती है।
भरी गाड़ी में सूप भारू नईं होत।
भरी गाड़ी में सूप भारी नहीं होता। बहुत खर्चे में थोड़ा खर्चा आसानी से समा जाता है।
भरी सभा में गूँगा बोले।
अयोग्य आदमी के बीच में बोलने की धृष्टता करने पर कहते हैं।
भरी सभा में साख भरें, उनके पुरखा नरकै गिरें।
जो चार आदमियों के सामने झूठी गवाही देते हैं उनके पुरखा नरक में जाते हैं।
भरे समुन्दर में घोंघा प्यासो। / भरोसे की भैंस पड़ा ब्यानी।
मानों कोई विलक्षण बात हुई।
भली भई जिजी सासरें गईं, जिजी की फरिया मोई कों भई।
ननद के रहते उसकी किसी वस्तु को छूना भी कठिन होता है। इसलिए उसके ससुराल चले जाने पर भावज प्रसन्न होकर कहती है कि, चलो अच्छा हुआ जिजी चली गयीं। उनकी साड़ी तो अब मुझे पहिनने को मिलेगी।