संत गणेश प्रसाद वर्णी का जन्म ललितपुर जिले के मड़ावरा नामक ग्राम में 16 सितंबर 1874 को एक असाटी वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम हीरालाल असाटी और माता का नाम उजियारी बाई था। उनका परिवार धर्म परायण और आर्थिक रूप से कमजोर था। गांव में मिडिल स्कूल तक शिक्षा का साधन था । अतः आगे की पढ़ाई रुक गई। 18 वर्ष की आयु में उनका विवाह हो गया और विवाह उपरांत ही उनके पिताजी का निधन हो गया। वे समीपस्थ एक जैन मंदिर में प्रवचन सुनने जाते थे जिससे उनके मन में जैन धर्म के प्रति आस्था जागृत हो गई। 4 वर्ष के पश्चात माता से विवाद होने पर उन्होंने घर का त्याग कर दिया और सिगरा ग्राम की धर्म माता चिरौंजी बाई के पास रहने लगे। उनकी प्रेरणा से जयपुर गए पुनः वापस आकर मुंबई के भूलेश्वर मंदिर में आकर स्वाध्याय किया और कुछ प्राच्य प्रणाली की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं ।
फिर जयपुर, मथुरा, खुरजा की विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं में अध्ययन किया फिर बनारस में मदन मोहन मालवीय के समान दर-दर भटककर धन संग्रह किया और स्याद्वाद महाविद्यालय की स्थापना की जो कि आज देश की प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में से एक है। संस्कृत के प्रति उनका यह सबसे बड़ा अवदान है।
बनारस के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में जैन दर्शन को शामिल कराया यह उनका बड़ा योगदान सिद्ध हुआ। पूरे देश में धर्म का प्रचार किया। 1954 में किसी कार्यक्रम में वर्णी जी ललितपुर आए तब सागर के जैन समाज के विशेष अनुरोध पर सागर आए और मोराजी की स्थापना की। वे जैन मुनियों के नियमानुसार चले और हमेशा छुल्लक जी के रूप में रहे। उन्होंने सागर और सागर के बाहर कई शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की। कई सामाजिक संस्थाओं का संचालन किया। उनके प्रवचन निराले और अद्भुत होते थे। जैन समाज ने उनके प्रवचनों को ग्रंथाकार में प्रकाशित भी कराया। विनोबा भावे ने उनके धार्मिक और सामाजिक कार्यों की सराहना की। अर्हत् मार्ग का अनुसरण करते हुए 19 जुलाई 1961 से अन्न त्याग दिया और 5 सितंबर 1961 को इस नश्वर शरीर को छोड़कर अमर हो गए।मोराजी में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। श्रीमती सुधा मलैया ने वर्णी जी के शैक्षणिक अवदान पर शोध प्रबंध तैयार कर पी एच. डी. की उपाधि प्राप्त की ।