बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटल संग्रह
बुंदेलखंड विश्वकोश

पं. गोविन्द प्रसाद सिलाकारी

पं.सिलाकारी का जन्म 1853 में चकराघाट सागर में पं. कुंजी लाल शास्त्री के यहां हुआ। आप तीन भाई थे - पं. नन्दी लाल, पं.बलदेव प्रसाद और छोटे स्वयं। आपकी बचपन से ही संस्कृत भाषा में विशेष रुचि रही। अस्तु, सागर में प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होने पर अग्रिम शिक्षा हेतु सीधे वृन्दावन चले गये। वहाँ उन्होंने वेद, कर्मकाण्ड, व्याकरण और संस्कृत साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद सागर नगर में वापस आकर संस्कृत पाठशाला में अध्यापन प्रारम्भ किया। इस पाठशाला में अध्यापन करते हुये वे 1913 में प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुये। पाठशाला में इनकी दीर्घकालिक सेवा को ध्यान में रखते हुये संस्था ने इनकी प्रतिमा वहाँ स्थापित की है जो आज तक व्यवस्थित रूप से संरक्षित है।

सबसे पहले संस्कृत पाठशाला दुलारी बाई मन्दिर में शुरू हुई। बाद में इतवारी टौरी के माहेश्वरी परिवार ने एक मकान दान में दिया था। इसमें नीचे रिछारिया मिष्ठान्न भण्डार है तथा प्रथम तल पर पाठशाला संचालित होने लगी। वहाँ स्थान की कमी होने लगी। तब पं. छेदी लाल भार्गव ने चकराघाट पर स्थान उपलब्ध कराया। वहाँ यह पाठशाला संचालित होने लगी। 1957 में लक्ष्मी नारायण सिलाकारी की अध्यक्षता में यह पाठशाला धर्मश्री स्थित वर्तमान परिसर में पहुंच गई। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस पाठशाला में श्री अरविन्द घोष, डॉ. हरीसिंह गौर, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पं. मदन मोहन मालवीय प्रभृति विभूतियों का आगमन हुआ। वर्तमान में सागर में संचालित विद्यालयों में यह सबसे प्राचीन विद्यालय है। वर्तमान में उनके परिवार के श्री के के सिलाकारी, वकील इस विद्यालय का संचालन करते हैं।

इस विद्यालय में बाहर से आने वाले विद्यार्थियों को आवास की सुविधा न होने से समस्या होती थी। तब पं. सिलाकारी ने विद्यार्थियों को आवास की सुविधा प्रदान करने के लिए धर्मश्री में ब्रह्मचर्याश्रम (वर्ष 1923) स्थापना की और दीर्घकाल तक उसका संचालन किया। यह बालक छात्रावास था। यहाँ अविवाहित बालकों को ही प्रवेश दिया जाता था, उपनयन संस्कार के बाद प्रथमा से शास्त्री तक शिक्षा प्रदान की जाती थी। 1957 में यह ब्रह्मचर्याश्रम धर्मश्री स्थित पाठशाला में समाहित/विलय हो गया। संस्कृत के संरक्षण हेतु यह इनका सबसे बड़ा योगदान है ।

पण्डित सिलाकारी के ही मार्गदर्शन में तीनबत्ती पर सरस्वती वाचनालय की स्थापना हुयी। पं.सिलाकारी जी सागर से काँग्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष चुने गये। आगरा में 1907 में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन हुआ, इसमें पं. सिलाकारी को विद्यावाचस्पति की उपाधि से विभूषित किया गया। पं. किशोरी लाल शास्त्री जैसे विद्वान आपके विद्यार्थी रहे महाकौशल प्रान्त में संस्कृत भाषा के सर्वाधिक प्रचार प्रसार का श्रेय पं. सिलाकारी को ही जाता है।

वर्ष 1936 में आप 83 वर्ष की आयु पूर्ण कर ब्रह्मलीन हुये।

क्या इस लेख में कोई त्रुटि है?