पं. हृषिकेश उपाध्याय जन्म सन् 1922 में नारायणी संस्कृत पाठशाला कटनी में सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में पंडित स्व. श्री लक्ष्मण प्रसाद जी उपाध्याय के यहां हुआ था। उनके पिता संस्कृत व्याकरण के मूर्धन्य विद्वान थे जो वहीं नारायणी संस्कृत पाठशाला में अध्यापक के रूप में ब्राह्मण बालकों को संस्कृत व्याकरण में विद्वान बनाने का कार्य कर रहे थे। वह पाठशाला आज भी सुचारू रूप से संचालित है। बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया था । उपाध्याय जी की प्राथमिक शिक्षा कटनी में ही पूर्ण हुई। पिता जी के निधन के बाद उनकी माता श्रीमती गणेशीबाई उपाध्याय उन्हें अपने साथ लेकर सागर आ गई एवं चमेली चौक में अपने पूर्वजों के द्वारा निर्मित छोटे से घर कैलाश मंदिर (शिवालय) सागर में निवास करने लगी। आर्थिक व्यवस्था के लिए इन्होंने सेठ रिखवदास मुणोत वकील (डॉ विजय मुणोत के पिताजी) से आग्रह किया। दयालु और सरल हृदय सेठ रिखवदास मुणोत वकील ने इनको पूर्ण सहयोग प्रदान किया। उनकी माताजी संस्कृत पढाने के उद्देश्य से उन्हें लेकर काशी (बनारस) चली गई और काशी में ही आगे की शिक्षा प्रारंभ हुई। 15 वर्षों तक काशी (बनारस) में ही कर्मकांड, व्याकरण, साहित्य, आचार्य की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। कर्मकांड अनुष्ठान में आप महारत प्राप्त कर सागर अपने घर आकर निवास करने लगे । पंडित हृषीकेश उपाध्याय जी ने सागर आकर सेठ रिखबदास मुणोत के आग्रह पर रानगिर (जंगल में स्थित) देवी मंदिर में एक महीने रहकर सेठ रिखबदास का अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान किया जिससे सेठ रिखबदास का मनोवांछित कार्य सिद्ध हुआ । तत्पश्चात पाण्डित्य के कार्य तथा यज्ञ आदि कार्य में आचार्य के रूप में कार्य कर अपनी जीविका चलाने लगे। पंडित हृषिकेश उपाध्याय जी ने संस्कृत के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपने भारतीय विद्या भवन मुंबई से संचालित संस्कृत बालबोध, प्रारंभ, काविद आदि परीक्षाएं आयोजित कीं एवं सागर के प्रत्येक स्कूल में जाकर कक्षा 6वीं से लेकर 8वीं तक के विद्यार्थियों से फार्म भरवाकर किताबें वितरित कीं। उन्होंने बच्चों में संस्कृत के प्रति रुचि जागृत करने में अत्यधिक परिश्रम किया। इनका विवाह खिमलासा के पास भरछा नामक ग्राम में पं. रामगुलाम तिवारी की कन्या ताराबाई के साथ सम्पन्न हुआ। उनके दो पुत्र हैं ज्येष्ठ पुत्र अंबिका प्रसाद जी पाण्डित्य का कार्य करते हैं। छोटे पुत्र पुरुषोत्तम उपाध्याय जी रेवेन्यू इंस्पेक्टर हैं । पंडित प्रेमनारायण द्विवेदी पंडित बलराम नागार्च, पंडित शिवरतन चतुर्वेदी उनकी मित्र मंडली में रहे। उन्होंने इतवारा बाजार सागर में सरस्वती जी का मंदिर बनवाया। हमेशा राम नाम की चादर ओढ़ कर राहगीर को राम नाम का स्मरण स्वतः कराते जाते थे। जीवन के अंतिम चरण में एक वर्ष तक फल फूल पर ही आश्रित रहे । पंडित जी ने देश- प्रदेश के अनेकों स्थानों पर होने वाले यज्ञों में आचार्य रहकर यज्ञों को विधिवत् सम्पन्न कराया। पं. हृषिकेश उपाध्याय जी श्री प्रेम प्रसारिणी सनाढ्य सभा में सदैव उपदेशक के पद पर पदस्थ रहे। श्री प्रेमप्रसारिणी सनाढ्य सभा के वरिष्ठ सदस्यों ने उन्हें सभापति के पद से भी सुशोभित किया पंडित जी ब्राह्मण समाज के बालकों की उन्नति के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। वे श्री प्रेमप्रसारिणी सनाढ्य सभा एवं संस्कृत महाविद्यालय धर्मश्री में प्रतिवर्ष समाज के बालकों के यज्ञोपवीत संस्कार कराकर उन्हें संस्कारित करने का सतत् प्रयास करते रहे। उन्होंने अपने शिष्यों को प्रेरणा देकर इतवारा बाजार सागर में मां सरस्वती देवी जी के मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा कराकर अनेक वर्षों तक मंदिर में पूजन कार्य किया। उनकी ख्याति सर्वत्र थी। उनके दो पुत्र हैं। छोटे पुत्र पं. पुरुषोत्तम उपाध्याय जी का शासकीय सेवा के साथ -साथ ही समाज में मंत्री एवं उपाध्यक्ष के रूप में सामाजिक कार्यों में सदैव उल्लेखनीय योगदान रहता है। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ईश्वर की आराधना तथा कर्मकांड एवं सामाजिक कार्यों के माध्यम से समाज को एवं समाज के बालकों को संस्कारी बनाने में लगाया। उनके दिखाये मार्ग पर आज भी समाज अग्रसर है। वे संस्कृत के ऐसे विद्वान थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ईश्वर की आराधना एवं संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। सादा जीवन व्यतीत करते हुए जुलाई 2008 में ब्रेन हेमरेज के कारण सागर शहर ने एक कर्मकांडी ब्राह्मण को खो दिया। वे 2008 में भौतिक शरीर को त्याग कर अनन्त की यात्रा पर चले गए।
पं. हृषिकेश उपाध्याय
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