पंडित जीवन लाल अग्निहोत्री का जन्म दिसंबर 1918 में ग्राम डिकौली जिला छतरपुर में हुआ। उनके माता-पिता अत्यंत निर्धन थे। निर्धनता के कारण उनकी पढ़ाई बाधित हो रही थी। लेकिन पंडित जी की लालसा और भगवत कृपा से उन्होंने गांव के एक सेठ का अनुष्ठान किया, अनुष्ठान सफल हुआ और सेठ ने इनको पर्याप्त से अधिक राशि दे दी। पंडित जी इस राशि को लेकर बगैर किसी को बताए बनारस चले गये। बनारस के क्वींस कॉलेज में प्रवेश लेकर प्रथमा, मध्यमा, शास्त्री और आचार्य तक की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। इसके पश्चात् सर्वदर्शन शास्त्री की उपाधि प्राप्त कर श्रीमद्भागवत, ब्रह्मसूत्र और ज्योतिष का अध्ययन किया। व्याकरण में हरिनारायण त्रिपाठी से अध्ययन कर विशेष दक्षता हासिल कर ली। वे अपने साथ के ही छात्रों को पढ़ाने लगे। विशेष प्रतिभावान होने के कारण बनारस की शास्त्रार्थ परंपरा में भाग लेने लगे और अपने से दोगुनी उम्र के विद्वानों को परास्त कर अपनी धाक जमा दी। उन्होंने बनारस में आजीविका हेतु कोई प्रयास नहीं किया और सागर आ गए, उनका यही निर्णय बाद में निराशाजनक साबित हुआ।
राष्ट्रपति पुरस्कृत पंडित प्रेम नारायण द्विवेदी उनके शिष्य रहे। 1976 के आसपास मुझे भी उनके श्रीचरणों में बैठकर पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर और उनकी आर्थिक विपन्नता को समझ कर कई लोगों ने उनकी आर्थिक मदद की।
संस्कृत पाठशाला ढाना, धर्मश्री विद्यालय सागर आदि संस्थाओं में न्यूनतम वेतन पर काम करने लगे। धीरे-धीरे सरकार की उपेक्षा से कई संस्कृत पाठशालाएं बंद हो गईं। तब वे भागवतकथा ज्योतिष आदि से अर्थाभाव में जीवन व्यतीत करने लगे। शासन ने उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर सागर में चकरा घाट पर उनकी प्रतिमा स्थापित कराई। वे अपने हाथ में कोई न कोई पुस्तक सदैव रखते थे।
विश्वविद्यालय में इन्हें दर्शनशास्त्र, संस्कृत और भाषाविज्ञान विभागों में समय-समय पर अध्यापन तथा व्याख्यान हेतु आमंत्रित किया जाता था। वे ग्रंथ को पढ़ कर कंठस्थ कर लेते थे। उन्हें कई ग्रन्थ कंठस्थ थे। उनके व्याख्यान विद्वत्तापूर्ण तथा अत्यंत रोचक हुआ करते थे। वे संस्कृत की वाचिक परंपरा के विद्वान थे। उनके चार पुत्र तथा चार पुत्रियां हुईं । सभी संतान संस्कृतज्ञ हैं । तीन पुत्र संस्कृत व्याख्याता पद पर सेवारत रहे हैं । दिनांक 23 दिसंबर 1980 को हृदयाघात से उनका निधन हो गया। शास्त्री जी के असामयिक निधन से सागर में संस्कृत परंपरा का एक स्तंभ ढह गया।