कुंजबिहारी शास्त्री जी का जन्म सागर जिले के बरारू पटकुई ग्राम में कर्मकाण्डी पण्डित एवं देवी उपासक पं.जगन्नाथ प्रसाद तिवारी के घर 1927 में हुआ। ये अपने मातापिता के इकलौते पुत्र थे। शास्त्रीजी की प्राथमिक शिक्षा ग्राम बरारू में तत्पश्चात् अयोध्या में हुयी। आपने परकोटा सागर स्थित चित्रगुप्त मन्दिर के ख्यातिप्राप्त पण्डित बट्टू लाल जी पाठक के सान्निध्य में संस्कृत का अध्ययन किया। आपने हाथरस से मानसशास्त्री की उपाधि प्राप्त की। इसके अनन्तर आप अपने ग्राम एवं आसपास के ग्रामों में पौरोहित्य एवं कर्मकाण्ड करने लगे। आपने स्वाध्याय के माध्यम से तन्त्र साधना की और इसकी शिक्षा अपने विद्यार्थियों को प्रदान की। उस काल में सागर की पाण्डित्य परम्परा में शास्त्रीजी का नाम शिखर पर था। इन्होंने सर्वोपाङ्ग कर्मकाण्ड, बन्धन मोक्ष और मानसप्रदीपिका नामक तीन ग्रन्थों की रचना की। आपने ग्राम के अनेक ब्राह्मण बालकों को कर्मकाण्ड और ज्योतिष की शिक्षा प्रदान की जो उनकी जीविका का आधार बनी। शास्त्रीजी का विवाह ग्राम बागखैजरा निवासी अग्निहोत्री परिवार में हुआ था। आपकी सन्तानों में 5 पुत्र एवं 2 पुत्रियाँ थीं। बड़े बेटे पं. सुरेश तिवारी श्रीमद्भागवत कथावाचक हैं, जगमोहनजी व्यापारी तथा ओमप्रकाश जी संस्कृत में स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त कर सागर में निवासरत हैं। पं. कुञ्ज बिहारी शास्त्रीजी आयु के अन्तिम पड़ाव तक स्वस्थ्य रहते हुये स्वाध्याय, भजनपूजन, शिक्षण एवं कर्मकाण्ड आदि में संलग्न रहे। उन्होंने अपने ही ग्राम बरारू में 93 वर्ष की आयु में देहत्याग किया।
शास्त्रीजी इन्दिरा कॉलोनी सिविल लाइन्स सागर में प्रत्येक रविवार को लोककल्याण हेतु सत्संग का कार्यक्रम करते रहे।इस कार्यक्रम में नगर के प्रबुद्ध एवं सुधिजन सम्मिलित होते रहे। शास्त्रीजी ने अपने जीवनकाल में शताधिक बार पुराणवाचन किया, अनेक यज्ञों में यज्ञाचार्य पद पर सुशोभित हुये। शास्त्रीजी गायत्रीउपासना के गहन साधक थे, वर्षों तक मौनव्रत रखकर उन्होंने गायत्री के सफल अनुष्ठान किये थे।