इनका जन्म सागर जिले के ग्राम अगरिया में सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार में पं. नन्द किशोर जी गौतम के घर मार्च 1912 में हुआ। इनकी माताजी अत्यन्त धार्मिक प्रकृति की महिला थीं। ये 5 भाई थे। उस काल में गाँव में कोई पाठशाला नहीं थी अतः वे प्राथमिक शिक्षा हेतु अपने गाँव के पं. नर्मदा प्रसाद गर्ग के माध्यम से होशंगाबाद चले गये। वहाँ से मैट्रिक तक शिक्षा प्राप्त कर वे वाराणसी चले गये जहाँ उन्होंने शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की। आपकी विलक्षण प्रतिभा से वाराणसी के विद्वान् बहुत प्रभावित हुए और आपसे वाराणसी में ही रहने का आग्रह करते रहे लेकिन वे अपने गृहग्राम वापस आ गये।
होशंगाबाद के एक संस्कृतप्रेमी निःसन्तान दम्पती के आग्रह पर शास्त्रीजी वहीं एक संस्कृत पाठशाला में अध्यापन करने लगे। उस दम्पती ने अपनी समस्त सम्पत्ति इस पाठशाला को भेंट कर दी। वे समय समय पर इस पाठशाला का संचालन किया करते थे। बाद में वे सागर में निवास करने लगे। सागर नगर में आप श्रीमद्भागवत एवं रामायण पर कथा प्रवचन करने लगे। रामायण एवं महाभारत संस्कृत साहित्य की श्रेष्ठ रचनाएं हैं। शास्त्रीजी ने सोचा कि रामायण तो जनमानस में रचा बसा है किन्तु महाभारत एक ऐसा ग्रन्थ है जो उस काल में समाज में रामायण के जैसा प्रचलित नहीं था। अतः उन्होंने महाभारत पर प्रवचन प्रारम्भ किया । आपकी व्याख्यान शैली इतनी रोचक और आनन्ददायक थी कि अल्पकाल में ही आपको सागर जिले में प्रमुख कथावाचक के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त हो गयी। आपके प्रवचन के कार्यक्रम में उमड़ी भीड़ को नियन्त्रित करने के लिये कई बार पुलिस की आवश्यकता पड़ती थी। कई बार भीड़ से उत्पन्न अव्यवस्था और मार्गों के अवरोध के कारण शास्त्रीजी को पुलिस की नाराजगी का सामना भी करना पड़ा। कई बार तो आपकी कथा के चलते सागर के सिनेमाघर प्रभावित हो जाते थे। शीघ्र ही सागर के साथ-साथ जबलपुर में भी आपकी कथा एक पहचान बन गयी। सागर नगर में राधेश्याम भवन के मुखिया श्रीलल्लूभाई पटेल के विशेष आग्रह पर शास्त्रीजी प्रत्येक वर्ष कथा प्रवचन करते रहे। सागर आने पर आपने बड़ा बाजार में निवास बनाया बाद में चकराघाट पर स्थायी निवास बनाया जिसमें इनके पुत्र श्री संतोष गौतम सपरिवार निवास करते हैं । प्रतिदिन | शिवजी का अभिषेक तथा धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन ही इनकी प्रमुख दिनचर्या थी। सागर की जेल में कैद खूँखार डाकुओं के हृदय परिवर्तन हेत इन्हें प्रवचनार्थ आमन्त्रित किया जाता रहा। उनका संस्कृत, हिन्दी, अँग्रेजी तथा बुन्देली भाषा पर अच्छा अधिकार था। धोती, कुर्ता, जैकेट, बड़े-बड़े व्यवस्थित बाल, माथे पर तिलक, ऊँचा पूरा शरीर आपके व्यक्तित्व को निखारता था। जीवन के अन्तिम समय में वे अपने गृहग्राम अगरिया चले गये और शेष जीवन शान्ति पूर्वक व्यतीत किया। 20 जून 1992 को वे ब्रह्मलीन हुए। होशंगाबाद में संस्कृत पाठशाला का संचालन तथा महाभारत जैसे संस्कृत महाकाव्य का सरस व्याख्यान शास्त्रीजी का संस्कृत के प्रति विशेष योगदान रहा।