बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटल संग्रह
बुंदेलखंड विश्वकोश

पं. सुंदरलाल शास्त्री

पं. सुन्दर लाल शास्त्री का जन्म 7 मार्च 1907 को कर्रापुर (सागर) के प्रतिष्ठित कान्यकुब्ज परिवार में पं.रामनाथ अग्निहोत्री के घर हुआ। आपने संस्कृत की प्रारम्भिक शिक्षा सागर में ब्रह्मचर्याश्रम से प्राप्त की तत्पश्चात् आपने काशीविद्यापीठ से व्याकरण शास्त्री, न्यायवेदान्त शास्त्री तथा ज्योतिषदिवाकर की उपाधियाँ अर्जित कीं। वे उच्च तन्त्र के भी निष्णात साधक थे। काशीविद्यापीठ में वे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के सहपाठी रहे। उस समय की काशी की शास्त्रार्थ परम्परा के आप सहभागी रहे। काशी से सागर आकर आपने सागर को ही अपना कर्मस्थल बनाया।यहाँ आपने ब्रह्मचर्याश्रम, जैन हाई स्कूल तथा महा. लक्ष्मीबाई कन्या हा. स्कूल सागर में संस्कृत का अध्यापन किया। आपके एक पुत्र एवं दो पुत्रियां शासकीय सेवा में रहे। आपके भाई पं. देवदत्त अग्निहोत्री सागर के प्रतिष्ठित वैद्य थे। शास्त्रीजी पं. भुवनेश्वर प्रसाद शास्त्री तथा पं शुकदेव तिवारी (सरस्वती वाचनालय) के फूफाजी थे।शास्त्रीजी के प्रियशिष्य श्री पुरुषोत्तम माहेश्वरी के कथनानुसार शास्त्रीजी के आध्यात्मिक गुरु परिव्राजकचार्य स्वामी निरञ्जनदेव सरस्वती उन्हें हरिद्वार में अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते रहे किन्तु शास्त्रीजी ने विनम्रतापूर्वक यह स्वीकार नहीं किया। आपने अपने गुरु के सद्ग्रन्थ श्रीमदलौकिक ब्रह्मात्मदर्शन के भाषा वाले संस्करण का सन् 1936 में सुन्दर प्रेस सागर से तथा स्वयं के द्वारा संस्कृत में अनुवादित संस्करण का मुद्रण/प्रकाशन निर्णयसिन्धु प्रेस मुम्बई से 1942 में करवाया। संस्कृत में आपकी मौलिक रचनायें हैं- ‘कांग्रेसस्य इतिवृत्तम्' तथा 'यत् किञ्चित् विद्यते'। संस्कृत के अलावा वे हिन्दी, मराठी, बांग्ला तथा गुजराती के भी अच्छे जानकार थे। शास्त्रार्थ परम्परा के अनुगामी होने के कारण वे धाराप्रवाह संस्कृत सम्भाषण तथा व्याख्यान में निष्णात थे। शास्त्रीजी प्राचीन और आधुनिक परम्परा के सेतु बनकर संस्कृत में अद्भुत व्याख्यान करने में पारङ्गत थे।

उनके पास उपलब्ध कतिपय पाण्डुलिपियाँ श्री माहेश्वरी जी द्वारा सागर विश्वविद्यालय के पाण्डुलिपि केन्द्र को दान कर दी गई। शास्त्रीजी सागर की विद्वत्परम्परा की विलक्षण प्रतिभा थे, उन्हें उस काल में वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे । आपने 13 सितम्बर, 1993 को नश्वर देह त्यागकर परमात्मा की शरण प्राप्त की।

क्या इस लेख में कोई त्रुटि है?