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अक्षर: ध

अक्षर 'ध' से शुरू होने वाली कहावतें

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धरम के दूने।

धोखाधड़ी का व्यापार करने वाले के लिए व्यंग्य में। दूने तो किसी धंधे में नहीं होते।

धरम धक्का खाओ।

कुछ दिनों ठोकरें खाओ, तब अक्ल आयेगी।

धरी की धरी रै जै (ये)।

ऐन मौके पर कुछ करते-धरते नहीं बनेगा। जो बात जहाँ है, वहीं रहेगी।

धाओं, धाओ, धाओ। करम लिखंतो पाओ।।

चाहे जितनी दौड़-धूप करो, जो भाग्य में लिखा है वही मिलता है।

धान कौ गाँव प्यार से जानों जात।

गाँव के बाहर पुआल के ढेर लगे हों तो उससे पता चल जाता है कि यहाँ धान होता है। बाहरी लक्षणों से किसी स्थान की धन-सम्पन्नता का पता चल जाता है।

धान गिरै सुभागे कौ, गोऊँ गिरै अभागे कौ।

धान के पौधों का धरती में गिरना और झुकना अच्छा होता है परन्तु गेहूँ की नहीं।

धान पुरानो, घी नओ।

चावल तो पुराना और घी नया अच्छा होता है।

धान सी कूटबो।

किसी को डंडों से खूब पीटना।

धान-पान हो रई।

धान-पान हो रही है। सुकुमार स्त्री के लिए कहते हैं कि बिना पानी के धान-पान की तरह कुम्हला रही है।

धान, पान, उखेरा, तीनऊँ पानी के चेरा।

धान, पान और ऊख की खेती के लिए पानी की अधिक आवश्यकता होती है।

धायें घन, न माँगे पूत।

दौड़-धूप करने से धन और माँगने से लड़का नहीं मिलता। जो भाग्य में है वही मिलता है।

धावे सो पावे।

परिश्रम करने वाले को उसका फल मिलता है।

धिंगानों रोपें।

व्यर्थ का झगड़ा रोपे हुए हैं। दो आदमियों की ऐसी तकरार के लिए कहते हैं जिसका लोग तमाशा देखें।

धींगे की धरती है।

धींगामुश्ती करने वाला आदमी ही दुनिया में आराम से रह सकता है।

धीरज धरें हाती नौ मन खात।

धीरज धरना चाहिए। भगवान सबको आवश्यकतानुसार देता है।

धीरा सो गंभीरा।

धीरज रखने वाला आदमी ही समझिए कि गंभीर है।

धीरे धीरे रे मना, धीरें सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, रितु आयें फल होय।। धीरो काम साहब को।

ईश्वर किसी काम में उतावली नहीं करता। वह जो कुछ करता है, सोच-समझ कर ही करता है।

धुआँ की मोटें बाँधबो।

धुएँ की गठरी बाँधना। व्यर्थ का, या असंभव काम करना।

धुआँ देखबो।

किसी का बुरा तकना। तुमाओ धुआँ देखें, अर्थात तुम मर जाओ।

धूनी पानी कौ संजोग।

दो रमते आदमियों का संयोग से मिलना।