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अक्षर: ध

अक्षर 'ध' से शुरू होने वाली कहावतें

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धूरा के पइसा बनाउत।

मुफ्त के पैसे सीधे करते हैं।

धूरा कों पटोरन ढाँकत।

धूल को रेशमी वस्त्र से ढँकते हैं। बेमेल काम करना।

धूरा छानी, ककरा निकरे।

धूल छानने से कंकड़ ही हाथ लगते हैं।

धेला को नयनी पै इत्तो गुमान। सोने की होती तो चलतीं उतान।।

धेले की नथनी पर तो इतना घमंड, सोने की होती तो चित्त होकर चलतीं। रूप या शृंगार का अधिक गर्व करना।

धोके में धवाकर1 लुट गई।

(1-झाँसी जिले का एक छोटा ग्राम।) अनजाने काम हो गया।

धोबी के घरै ब्याव, गदा ने छुट्टी पाई।

मालिक के घर आनंद-उत्सव होने से नौकर को भी छुट्टी मिली।

धोवी कौ कुत्ता, घर कौ न घाट कौ।

जब कोई आदमी इधर-उधर मारा-मारा फिरे और कोई भी एक काम ठिकाने से न कर पाये तब उसके लिए कहते हैं।

धौर चलौ न उपटो खाओ।

न दौड़ कर चलो, न उपेटा लगे। उतावली अच्छी नहीं।

बनी हूजे, कै ढोर हूजे।

या तो भगवान धन देवे, या फिर पशु ही बनाये।