अक्षर: ख
अक्षर 'ख' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंखाओ न पिओ ऐसेंइँ जिओ (अथवा खाओ न पिओ जुग जुग जिओ।)
जब कोई आदमी किसी से काम तो पूरा लेना चाहे परन्तु खिलाने-पिलाने में कंजूसी करे तब काम करने वाले की ओर से उपालम्भ।
खाकें आए हौ के जाकैं खैहौ।
मेजबान की ओर से मेहमान को भोजन की पूर्णत: मना ही।
खाकें मूतै, सोवे बायें। ताकें बैद कबहुँ ना जायें।।
भोजन के बाद तुरंत पेशाब करने और बायीं करवट सोने से आदमी कभी बीमार नहीं पड़ता।
खाड़ खने जो और को बाको कूप तयार।
दूसरों को हानि पहुँचाने का प्रयत्न करने वाला स्वयं हानि उठाता है।
खात के अपने, अचेउत के पराये।
खाने भर के लिए हमारे, और हाथ मुँह धोने के लिए दूसरे के। अर्थात केवल मतलब के दोस्त हैं। भोजन हमारे यहाँ किया और तुरन्त ही उठ कर चले गये दूसरे के यहाँ।
खाने; कै गिरम्म1 गेरने।
(1-गिरमा, ढोर बाँधने की रस्सी, पगैया। तुम्हें खाना है या रस्सी का चक्कर काटना है? अर्थात तुम्हें अपने काम से मतलब या हमें व्यर्थ परेशान करना है।
खाबे कों मौआ, पैरवे कों अमौआ1।
(1-एक प्रकार का खाकी रंग जो आम के पत्तों से बनता है। आम के पत्तों से बने हुए रंग में रंगा कपड़ा।) खाने को महुआ, पहिनने को अमौआ।
खाय खेले तो पिराय का ?
खाता-खेलता रहे तो पीड़ा कहाँ से हो? ऐसे बच्चों के लिए जो सदैव बीमार रहते हों।
खायें खायें पार बड़ात।
खाते-खाते पहाड़ भी बिला जाता है। बैठे-बैठे खाने से चाहे जितना धन क्यों न हो, एक-न-एक दिन खत्म हो जाता है।
खायें गदयानें1, भोंकन जायें चमरयाने।
(1-गदयाना-धोबियों का मुहल्ला, जहाँ गधे रहते हैं।) खायें धोबियों के मुहल्ले में और भोंकने जायें चमारों के मुहल्ले में। खायें किसी का, काम किसी का करें।
खायें पियें होओ तौ बने रओ।
खा-पी कर आये हो तो बने रहो। जब किसी आदमी को खाने-पीने के लिए न पूछा जाय तब उसकी ओर से व्यंग्य में।
खाली हातन आये, खाली हातन जाने।
संसार में न तो कोई कुछ लेकर आया और न यहाँ से कोई कुछ लेकर जाता है।
खालो पीलो सो अपनो।
खाया-पिया ही संसार में काम आता है और तो सब नष्ट हो जाता है।