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अक्षर: ख

अक्षर 'ख' से शुरू होने वाली कहावतें

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खावे कों मलाई, बोलने कों म्याऊँ।

खाने को माल-मसाले परंतु काम के वक्त आँख दिखाना।

खावें-पीवें लरका बिटियाँ, सत्त कों डुकरियाँ।

माल-मसाले तो उड़ायें जवान लड़के और लड़कियाँ, और व्रत-उपवास या कठिन कार्य के लिए बूढ़े आदमी ! जब घर या समाज में किसी एक व्यक्ति पर ही किसी काम की सारी जिम्मेवारी छोड़ दी जाय और दूसरे व्यक्ति आराम से बैठे तमाशा देखें तब प्रयुक्त।

खासी तोरी घर-घिनौची1 खासी तोरी चाल।

(1-पानी रखने का स्थान, जलधरा।) अनहोना काम करने पर व्यंग्य।

खिसयानी बाई पुँआर1 लौंचें।

(1-एक छोटा जंगली पौधा, जिसकी जड़ बड़ी मजबूत होती है।) लज्जित होकर क्रोधित होना, अथवा किसी का गुस्सा किसी पर उतारना।

खिसयानो भाँड़ दिवारी1 गावे।

(1-दीपावली के अवसर पर गाये जाने वाले गीत, जो चिल्ला कर ऊँचे स्वर में गाये जाते हैं।) जब कोई आदमी किसी न किसी प्रकार अपना क्रोध शान्त करना चाहे, या गुस्से में ऊट-पटांग बात करे।

खुआवे, पियावे कौ नाव नई, मारवे कौ नाव।

खिलाने-पिलाने का तो नाम नहीं मारने का नाम। दूसरे के बालक को चाहे जितना लाड़-प्यार से रखो, उसे तो कोई नहीं देखता, परन्तु थोड़ा भी पीट देने से अपयश हाथ आता है।

खुदा मिले और नंगे सिर।

अपने ही मतलब की बात करना, दूसरे की न सुनना।

खुरदरी भींत पै चितेउर करत।

खुरदरी दीवाल पर चित्रकारी करते हैं। ऊटपटांग काम करते हैं।

खुरपी कों टेढ़ो बेंट मिलई जात।

खुरपी को टेड़ा बेंट मिल ही जाता है। जैसे को तैसा मिल जाता है।

खुली किवरियाँ डरीं।

खुली खिड़की पड़ी है। अर्थात सदैव तुम्हारा स्वागत है। कभी भी आ सकते हो।

खुंस1 में मुंस नई मिलौ तौ कौन काम कौ ?

(1-क्रोध, अप्रसन्नता।) क्रोध में यदि दूसरा पति तलाश नहीं कर लिया तो बाद में किस काम का ? अथवा क्रोध में पति को तलाश करके उस पर अपना गुस्सा नहीं उतारा हो तो बात ही क्या रही ?

खुसामद से आमद है।

खुशामद से ही पैसा मिलता है।

खुसी कौ सौदा।

कोई जबर्दस्ती नहीं। लेना हो लो, न लेना हो, न लो।

खूंटा के बल बछरा नाचे।

किसी के बल-बूते पर ही आदमी किसी बड़े काम को करने की हिम्मत करता है।

खूब खाई तातीं-तातीं।

खूब गरम-गरम खायीं ! आदर-सत्कार न होने पर व्यंग्य में कहते हैं।

खेत कबीरा लुन लये, सिला बीन लये सूर। बची खुची तुलसी लई, जगत बटोरे धूर।।

फसल तो कबीर ने काट ली, दाने सूर ने बीन लिये। बचा-खुचा तुलसी ने लिया। अन्य कवि तो अब केवल धूल बटोरते हैं।

खेत के बिजूका1।

(1-पशु-पक्षियों को डराने के लिए खेत में खड़ा किया गया घास-फूस का ऐसा ढाँचा जो दूर से देखने पर आदमी सा जान पड़ता है। ऐसा व्यक्ति जो न स्वयं खाय और न खाने दे।