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अक्षर: ख

अक्षर 'ख' से शुरू होने वाली कहावतें

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खेत न जोते राड़ी, ना जनी मरव की छाँड़ी। न भैंस बिसाहे पाड़ी, ना बिपदा लेवे आड़ी।।

ऊसर का खेत नहीं जोतना चाहिए, दूसरे पुरुष की छोड़ी हुई स्त्री नहीं करनी चाहिए, बिना गाभिन हुई भैंस नहीं खरीदनी चाहिए, और जान-बूझ कर कोई विपत्ति भी मोल नहीं लेनी चाहिए।

खेत बिगारै खरतुआ सभा बिगारै दूत।

खर-पतवार से खेत बिगड़ता है, और चुगलखोर से सभा का आनंद।

खेत राखे बारी खों, बारी राखै खेत खों।

एक यदि दूसरे का ध्यान रखे तो दूसरा उसका भी ध्यान रखता है।

खेती आप सेती।

खेती को स्वयं न देखा जाय तो उससे कोई लाभ नहीं।

खेती करें अधिया, बैल ना बधिया।

अधिया-बँटिया से खेती करना चाहते हैं, परन्तु गाँठ में न बैल है न बधिया।

खेती करै ऊस कपास। घर करै व्यवहरिया पास।।

खेती ऊख कपास की करना चाहिए और घर साहूकार के पास बनाना चाहिए ताकि वह समय पर काम आ सके।

खेते बारी खाय तौ बिध से कहा बसाय।

स्वयं बाड़ ही यदि खेत को खाने लगे, अर्थात् रक्षक ही यदि भक्षक बन जाय तो फिर उसके लिए क्या किया जाय ?

खेल में काये के लालाजी1।

(1-बुन्देलखंड में लाला दामाद और देवर को कहते हैं।) खेल में छोटे-बड़े सब बराबर हैं।

खो गओ लाँगा नंदई खों भयो।

खो गया लँहगा नंद के लिए ही हुआ। किसी को कुछ न देकर व्यर्थ का अहसान करना।

खोटो पइसा और खोटो लरका बखत पै कामें आऊत।

खोटा पैसा और खोटा लड़का समय पर काम आता है।

खोदंत पानी, घोकंत विद्या।

खोदने से ही पानी निकलता है, अभ्यास से ही विद्या आती है।

खौरियाऊ1 कुलिया मखमल की झूल।

(1-खौरही, गंजी, खजेलू।) दे. कौरयाऊ कुतिया...

पा. खेती, पाती, बीनती और खुजावन खाज। घोड़ा आप पलानिये जो पिय चाहो राज।। खेती बारो झक मारे। हँसिया बारो खों1 गाड़े।।

(1-खंती, जिसमें अनाज संग्रह करके रखा जाता है।) खेती से स्वयं किसान को इतना लाभ नहीं होता जितना फसल काटने वाले मजदूरों को, क्योंकि उन्हें तो परिश्रम के पैसे मिलते हैं, गाँठ से कुछ लगाना नहीं पड़ता।

सट्टयाऊ1 चपिया, ऊमर कौ अथानौ2।

(1. खटाँद देने वाली, बुरी, बदबूदार। 2-अचार।) गूलर का अचार, वह भी बदबूदार बर्तन में रखा गया। एक तो वस्तु पहिले से ही बहुत अच्छी नहीं, और यदि उसमें कुछ अच्छाई भी थी तो उसको भी नष्ट कर दिया गया।