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अक्षर: ज

अक्षर 'ज' से शुरू होने वाली कहावतें

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जो धावे सो पावै।

प्रयत्न करने वाले को ही लाभ होता है।

जो न भावै आपै, सो देय बहू के बापै।

जो वस्तु स्वयं अच्छी न लगे उसे दूसरे के मत्ये मढ़ना।

जो न मानें बड़न की सीख, ले खपरिया माँगे भीख।।

बड़ों की सीख न मानने पर हानि उठानी पड़ती है।

जो मूंदे कंबल के छेद। सो जाने जाड़े कौ भेद।।

कंबल पर एक पतला चादर भी डाल लेने से वह अधिक गरमाता है।

जो मोय जोते टोर मरोर। बाकी कुठिया देहों फोर।।

खेत कहता है, जो किसान मुझे अच्छी तरह तोड़-मरोड़ कर जोतता है अन्न से मैं उसका कुठला भर देता हूँ।

जो सबकों हुइये सो हमाओ हुइये।

जो सबका होगा सो हमारा होगा। सबके साथ हम भी परिणाम भुगतने को तैयार है।

जो हतिया पूँछ डुलावे। तौ पैसा पइली बिकावे।।

हस्त नक्षत्र में पानी बरसने पर रबी की फसल को लाभ होता है।

जोगी कैसी फेरी।

प्रियजनों का आना-जाना कम हो जाना।

जोगी कौ डेरा कुँमाँर के घरै।

जैसे की संगत तैसे के साथ ही होती है।

जोगी जुगत सें जुग जुग जिये।

योगी संयम से रह कर ही दीर्घायु पाता है।

जोरा तँगोरी कौ व्याव, चचा लटकनियाँ।

जोड़-तँगोड़ कर किसी प्रकार तो लड़की का विवाह किया और वह कहती है-चचा, लटकन बनवा दो !

जोरिया से ऐंठत।

रस्सी-से ऐंठते हैं। व्यर्थ अकड़ते हैं।

जोरू चिकनी, मियाँ मजूर।

जिसकी स्त्री बहुत बन-ठन कर रहती हो उसके लिए व्‍यंग्‍य में।