अक्षर: ज
अक्षर 'ज' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंजीके जैसे बाप मताई तीके तैसे लरका। / जीके जैसे नदिया नारे, तीके तैसे भरका1।।
(1- नदी किनारे के बड़े गड्डे, खड्डी।) संतान अपने माता-पिता के ही अनुरूप होती है।
जीको आँड़ू बिकै, बो बधिया काय खों करें।
जिसका आँडू बैल ही बिके वह बधिया क्यों करै। जिसका काम आसानी से हो जाय, वह उसके लिए फिर अधिक कष्ट क्यों उठाये ?
जीको ढँड़क जात, सो रूखो खात।
जिसका घी गिर जाता है वही रूखा खाता है। जिसकी हानि उसी को भुगतनी पड़ती है।
जीकौ काम ओई खाँ छाजे। गद्धा मूंड़ डेंड़का बाजै।
जिसका काम उसी को शोभा देता है। दूसरा करै तो उसे हानि उठानी पड़ती है।
जीकौ जौन सुभाव जाय नईं जी सें। / नीम न मीठी होयँ खाओ गुर घी से।। / जीकौ पेट पिरात सो अजवान ढूँढ़त।
जिसे जिस वस्तु की आवश्यकता होती है वह उसे स्वयं खोजता फिरता है। (बच्चा पैदा होने पर स्त्रियाँ अजवायन खाती हैं। उदर-विकारों की तो वह एक बढ़िया औषध है ही।)
जीकौ लरका घूँटइ-घुँट्यन ऊकी बरात कौ का पूंछने।
जिसका लड़का घुटनों चलता है अर्थात अबोध या लँगड़ा है उसकी बरात का क्या पूछना ? वह अवश्य विलक्षण होगी। थोड़ा देख कर बहुत समझना।
जीनें चोंच दई सो चुन दे (ए)।
जिसने पैदा किया वह खाने को भी देगा। भगवान का भरोसा।
जीभ कैसो रहबो है।
जिस प्रकार दाँतों के बीच में जीभ रहती है उसी प्रकार परवश होकर रहना।
जुग फूटौ, नर्द1 मरी।
(1-चौसर की गोट।) जब तक एका है, तभी तक बल है। अलग हुए और पिटे। चौसर के खेल में जब तक दो गोटें एक घर में रहती हैं तब तक उन्हें कोई मार नहीं सकता।
जुत जुत मरें बैलवा, बैठे खायँ तुरंग।
बैल बेचारे खेत जोत-जोत कर मरते हैं और घोड़े आराम से बैठे खाते हैं।
जुर, जाचक, उर पाउनों, चौथो माँगनहार। / लाँघन तीन कराय दे, फेर न आवे द्वार।।
ज्वर, भाट, पाहुना, और भिखारी, इनको तीन दिन भूखों मारे तो ये फिर दरवाजे पर लौट कर नहीं आते।