अक्षर: घ
अक्षर 'घ' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंघर कौ चून चुखरियाँ खायें, पराये खाँ डुबकैयाँ लेयँ !
जब घर में सब प्रकार का सुभीता होते हुए भी कोई आदमी इधर-उधर खाने-पीने की फिक्र करे तब कहते हैं।
घर कौ परसइया, अँदियारी रात।
एक तो अँधेरी रात, दूसरे परोसने वाला अपना, जितना चाहो खाओ और उठा ले जाओ, कोई देखने वाला नहीं। अथवा घर का परसने वाला और अँधेरी रात, इसलिए पंगत में घरवालों को मनमाना परसता है, दूसरों को छोड़ देता है।
घर कौ बालक चोरी करै, कओ राम घर कैसें चले ?
'जब घर के लोग ही हानि पहुंचायें तो फिर घर की रक्षा कैसे हो सकती है।
घर कौ भूत सात पैरी के नाव जानत।
यहाँ घर के भेदी से मतलब है। जिस प्रकार घर का भूत सात पीढ़ी तक के लोगों के नाम जानता है, उसी प्रकार भेदिए को भी घर की सब भीतरी बातों का पता रहता है। इसलिए उससे सावधान रहना चाहिए।
घर खावे आरौ, कै सारौ।
आले के होने से तो दीवाल कमजोर होती है, और साले के होने से घर बर्बाद होता है क्योंकि अपनी बहिन के कारण, वह मनमाना खाता-पीता है।
घर खीर तौ बाहर खीर।
बड़े आदमी का सब जगह आदर-सत्कार होता है, अथवा घर जैसा सम्मान बाहर भी चाहते हैं जो संभव नहीं।
घर खोवें और आसपास, तिनको नाव रामदास।
जो अपना और दूसरों का भी काम चौपट कर दे, ऐसे आदमी के लिए प्रयुक्त।
घर गुन बहू, सार1 गुन बच्छा।
(1-ढोर बाँधने का घर, पशुशाला।) बहू जैसे घर की होती है वैसे ही गुण उसमें आते हैं, उसी तरह बछड़ा भी जैसी सार में बँधता है वैसे ही अच्छे या बुरे लक्षण उसमें प्रकट होते हैं।
घर घर कयें, कै नाँउन1 से।
(1-नाइन, नाई की स्त्री।) यदि बात घर-घर पहुँचानी है तो नाइन से कहना ठीक होगा। इधर की उघर भिड़ाने वाले पर व्यंग्य।
घर घर के निपट लो, बराती भौत हैं।
घर-घर के जीम लो, बराती बहुत हैं। पहिले अपना काम बनाओ, फिर दूसरों की चिन्ता करना।
घर घर मटया चूले हैं।
सब घरों का एक सा हाल है, अथवा सब घरों में कुछ-न-कुछ भेद की बात रहती है।
घर बरो सो बरो, चोंखरन की ऐंड़ तौ खुल गई।
घर जला तो जला, चोंखरों की अकड़ तो खुल गयी। घर के जलने से वे भी जल गये अथवा भाग गये। जब कोई थोड़े से लाभ के लिए अपनी बड़ी हानि कर बैठे तब उस पर व्यंग्य।
घर बैठे मुतियन चौक पूरत।
घर बैठे ही मोतियों के चौक पूरते हैं। काम-धंधा न करके बैठे-बैठे मंसूबे बांधते हैं।