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अक्षर: घ

अक्षर 'घ' से शुरू होने वाली कहावतें

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घिना लड़इया छींट कौ बागौ।

घिनौना गीदड़ और छींट का जामा।

घिसे बिना चिलक नईं आऊत।

आदमी को दबाये बिना काम नहीं निकलता। घिसने का अर्थ खुशामद करना भी हो सकता है। खुशामद किये बिना काम नहीं बनता।

घी किते गओ ? कई खिचरी में।

जो वस्तु जहाँ खर्च होने को थी वहाँ खर्च हो गयी।

घी के कुप्पा से लगे।

ऐसे स्थान पर पहुँच जाना जहाँ खूब खाने को मिले।

घी खिचरी हो रये।

दोनों का एक गुट हो रहा है।

घी देतन नर्रयात। अथवा घी देतन बामन नर्रयात।

भलाई करते बुराई मानते हैं। जाड़े के दिनों में घोड़े को स्वस्थ रखने के लिए घी दिया जाता है, जिसे वह आसानी से नहीं खाता।

घी नई तौ कुप्पई बजाओ।

निराशा के प्रति व्‍यंग्‍य।

घुल्ला जा पार के बा पार।

घोड़ा इस पार या उस पार। परिणाम कुछ भी हो, काम करना ही है।

घुसया हाकिम मुसया चाकर।

रिश्वतखोर हाकिम और चोर नौकर ये दोनों अच्छे नहीं।

घूंघट लौं की लाज।

एक बार लाज-शरम टूटी सो टूटी।

घूँटे नउत तब पेटई कों।

घुटने पेट ही को नवते हैं। आत्मीय जनों का सब पक्ष लेते हैं।

घोड़न कौ चारौ गदन कों नई डारौ जात।

अयोग्य को अच्छी वस्तु नहीं दी जाती।

घोड़ा की लात घोड़ई सऊत।

घोड़े की लात घोड़ा ही सहन कर सकता है। बड़ों की ठोकर बड़े ही सहन करते हैं।

घोड़ा कौ पछारी और हाकिम की अँगारी। (इनसें बचें चइये)

घोड़े के पीछे खड़े होने से दुलत्ती लगने का डर रहता है और हाकिम के आगे चलना धृष्टता है। इनसे बच कर चलो।

घोड़ा घास से यारी करें तौ खाय का ?

प्रायः रिश्वत लोरों के लिए व्‍यंग्‍य में कहते हैं।