अक्षर: द
अक्षर 'द' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंदेवता तौ बासना के भूँके हैं।
देवता कुछ खाते नहीं। वे तो सच्चे विश्वास से ही प्रसन्न होते हैं।
देवी दिन काटें, पंडा परचो माँगे।
देवी तो किसी प्रकार दिन काट रही हैं और पंडा कहता है कि कुछ चमत्कार दिखाइए।
देस चोरी, परदेस भीक।
जब कोई बहुत दरिद्र होकर चोरी और आवारागर्दी करने लगता है तब उसके लिए कहते हैं।
देसै देसै ढार1, कुले कुले ब्योहार।
(1- ढंग।) देश-देश की रीति और कुल-कुल का व्यवहार अलग होता है।
देह धरे कौ दंड भोगने।
शरीर के साथ बीमारी लगी ही रहती है। जो कष्ट बदा है वह भोगना ही है। प्रायः बीमार आदमी कहता है।
दो घर कौ पाउनों भूकन मरत।
दो घर का पाहुना भूखों मरता है। किसी काम के लिए दो मनुष्यों पर आश्रित रहने वाला व्यक्ति धोखा खाता है।
दो माटी के बुर (अ) ये होत।
एक की जगह दो मनुष्य सब कुछ कर सकते हैं। संगठन में बड़ी शक्ति होती है।
दोऊ दीन से गये पाँड़े। हलुआ मिले न माँड़े।।
लोभवश एक काम छोड़ कर दूसरा करने गये और वह भी न हुआ।
दोऊ पलीतन1 दै दो तेल। तुम नाँचो, हम देखें खेल।।
(1-पलीता (अ. फलीतः), पंसाखों में लगायी जाने वाली कपड़े की बत्ती, मसाल में लपेटा गया कपड़ा।) जब कोई दो मनुष्यों में झगड़ा करा कर उनका पैसा खर्च कराये और तमाशा देखे, साथ ही अपना उल्लू भी सीधा करे।
दोज कौ बायनो,1 तीज कों फेर दओ।
(1-वह मिठाई जो उत्सवादि के अवसर पर सगे-संबंधियों तथा इष्ट मित्रों के यहाँ परस्पर व्यवहार के रूप में भेजते हैं।) दोज का बायना तीज को फेर दिया। एहसान लौटाल दिया। किसी का कोई निहोरा नहीं रखा।
दौंदर1 बड़ौ, कै लाबर2।
(1-दौंदरा करने वाला, जोर-जोर से बोलने वाला, उपद्रवी। 2-झूठ बोलने वाला।) निसंदेह लाबर की अपेक्षा दोंदर ही बड़ा होता है।