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अक्षर: द

अक्षर 'द' से शुरू होने वाली कहावतें

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दिया तरें अँधियारो।

जहाँ विशेष प्रबंध और विचार की आशा हो वहाँ ही अंधेर होने पर।

दिवारी के चोंखें पड़ा मोंटो नईं होत।

दीपावली के दिन माँ का दूध चोंखने से पड़ा मोटा नहीं होता। एक दिन अच्छा भोजन कर लेने से कोई तगड़ा नहीं हो जाता।

दीनदुनिया की खबर नइयाँ।

किसी बात का पता न रखना। काम काज से बेखबर रहना।

दुअन में दो कौंड़ी धरबो।

कौड़ी के खेल में दो का दाव लेने वाले को दो कौड़ी और रख दी गयीं ! हानि की समस्या तैयार हो गयी। झगड़ों को बढ़ा देने के अर्थ में प्रयुक्त।

दुआरे कौ चार, बीच कौ लेखो।

द्वारपूजा के समय मध्य का लेखा। बे अवसर का काम।

दुकान कों एक घड़ी को भूलो, तौ दुकान कये मैं तोय सब दिन कों भूलों।

दुकान पर हमेशा बैठा रहना चाहिए पता नहीं ग्राहक कब आ जाय।

दुकान फैलावे की जरूरत नइयाँ।

यहाँ सामान खोलने की जरूरत नहीं। किसी आदमी से पिंड छुड़ाने के लिए कहते हैं।

दुकानदारी लरम की, बहू बिटिया सरम की, सिपाईगिरी गरम की।

दुकानदार तो वही जो विनम्र हो, बहू-बेटी वही जो लज्जाशील हो, और सिपाही वही जो तेज-तर्रार हो।

दुख सुख कौ जोड़ा है।

दुःख के साथ सुख और सुख के साथ दुःख लगा रहता है।

दुनियां ठगिये मक्कर सें। रोटी खैये सक्कर सें।।

दुनिया में सीधे-सच्चे आदमी का गुजारा नहीं। जाल-फरेब से लोगों को ठगने वाले आदमी ही मौज से रहते हैं। उन पर व्यंग्य।

दूद कौ जरौ, मठा फूँक-फूँक कें पियत।

एक बार किसी काम में बहुत हानि हो जाने पर दूसरी बार मनुष्य उस काम को अत्यधिक सावधानी से करता है।

दूद कौ दूद और पानी कौ पानी।

ऐसा न्याय करना कि जिसमें किसी पक्ष के साथ तनिक भी अन्याय न हो।

दूद-पूत माँगें नई मिलत।

धन और संतति भाग्य से ही मिलती है। माँगने से नहीं।

दूद-भात छोड़ै, पै संग न छोड़े।

यात्रा में यदि कोई साथी मिल रहा हो तो दूध-भात का खाना भले ही छोड़ दे पर उसका साथ न छोड़े, अर्थात् तुरंत उसका संग पकड़ लेना चाहिए।