अक्षर: द
अक्षर 'द' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंदाद-खाज उर सेउआ बड़भागी कें होयें। / परे खुजावें खाट पै, बड़ आनंदी होयँ।।
खाज-ग्रस्त लोगों से व्यंग्य में।
दादा परदादा के राज की बातें करबो।
पुराने जमाने के भले दिनों की व्यर्थ चर्चा छेड़ना।
दादू दो-दो ना बनें जा लै बा लै डार।
एक समय में एक ही काम अच्छी तरह हो सकता है।
दान की बछिया के दाँत नईं देखे जात।
मुफ्त की चीज के विषय में क्या देखना कि कैसी है? जैसी मिले वैसी ही अच्छी।
दान दीन कों दीजिये मिटै दरद को पीर। / ओखद ताकों दीजिये जाके रोग शरीर।। / दान, भारो, वच्छना; इनमें उधार कौ काम ना।
दान, भाड़ा, और दक्षिणा, इनका उधार ठीक नहीं।
दान में सें दान देय, तीन लोक जीत लेय।
दान में मिले हुए पैसे में से जो व्यक्ति दूसरों को दान दे उससे बढ़ कर संसार में कोई नहीं।
दाना देयँ न घास, खुरौरौ छः छः बेर।
झूठी सेवा-सुश्रूषा करना। आवश्यक वस्तु न देकर अनावश्यक वस्तु बार-बार देना।
दाम देओ गन्नेटी खाओ। टूटै पलकिया1 जी से जाओ।।
(1-मेले-तमाशे में लगने वाले चक्करदार हिंडोले की पालकी।) गाँठ के दाम दो और चक्कर खाओ, पालकी टूटे तो प्राणों से हाथ धोओ; ऐसे हिंडोले में बैठने से लाभ क्या ? किसी काम में पैसा खर्च करके लोगों की ऐंचातानी भी सहना पड़े तब कहते हैं।
दाम न छिदाम, मिठाई देखें रो रो आवे।
पैसे के बिना किसी वस्तु को लेने की इच्छा करना।
दार भात में मूसरचंद।
दो आदमियों की बात में तीसरा व्यर्थ हस्तक्षेप करने पहुँच जाय तब।
दिखनारीं दायजें नईं आउतीं।
यदि कोई चाहे कि दहेज के साथ वे स्त्रियाँ भी मिल जायें जो उसे देखने आती हैं, तो यह संभव नहीं।
दिन कों बादर रात कों तारे। चलो कंत जहँ जीव बारे।।
वर्षाऋतु में दिन में यदि आकाश में बादल घिरे रहते हों, और रात में तारे निकल आते हों, तो फिर समझना चाहिए कि पानी नहीं बरसेगा और अकाल पड़ेगा।
दिन भर नायँ मायँ, जुँदैयन कपास बीनें।
दिन भर तो इधर-उधर घूमें और चाँदनी में कपास बीननें जायें। ठीक समय पर काम न करना।
दिन भर नायँ मायँ, रात में उलरों क्यायँ ?
दिन में इधर-उधर घूमें और रात में कहें कि मैं लेटू कहाँ ? घर का कोई काम-धंधा न देखने वाले, आवारा और मटरगश्ती करने वाले लड़कों के लिए।