अक्षर: ब
अक्षर 'ब' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंबऊ नौनी कै बेगर1।
(1-अचार का मसाला।) बहू अच्छी या बेगर ? पैसा खर्च करने से ही काम अच्छा बनता है। उसके लिए किसी को श्रेय देना व्यर्थ है।
बऊ सरम की, बिटिया करम की।
बहू लज्जाशील और बेटी भाग्यवान अथवा कर्मठ अच्छी होती है।
बखत चूकें जुगन कौ फेर।
समय चूकने पर युगों का अंतर पड़ जाता है। बीता अवसर हाथ नहीं आता।
बखरी में हर बँधाव, जोतो का मँझोटो ?
घर में हल मँगा कर रखा, तो क्या आँगन जोतोगे ? कोई बड़ा काम छिपा कर नहीं किया जा सकता। अथवा जो काम जहाँ करने का है वहीं किया जाता है।
बछेरू से लगै ना, खंचारी1 सें लगा दें।
(1-मरे हुए बड़े की खाल का बना ढाँचा जो दूध देने वाली गाय का बछड़ा मर जाने पर उसे दुहने के लिए काम में लाया जाता है।)
बजार भाव पिटबो।
बुरी तरह पीटना। मरम्मत होना। बाजार में वस्तुओं के दामों में गिरावट होना।
बजार लगो नईं, उचक्कन ने डेरा डार दओ।
वस्तु तो तैयार नहीं, चाहने वाले पहिले से आ गये।
बट-पीपर की छाँय, संगत बड़न की।
छाया तो वट-पीपल की और संगत बड़ों की अच्छी होती है।
बटिया खेती साँट-सगाई, जामें नफा कौन ने पाई।
(1-ऐसा विवाह जिसमें कोई अपनी लड़की का संबंध किसी के वहाँ करे तो उसके बदले में उसकी लड़की के साथ अपने या अपने किसी निकट के रिश्तेदार के लड़के का संबंध करने को तैयार हो जाय।) बटिया की खेती और साँटे की सगाई में किसी को लाभ नहीं होता।
बट्टे खाते परबो (अथवा जाबो)।
किये हुए प्रयत्न का व्यर्थ जाना। सटाई में पड़ना। रकम बमूल होने की उम्मेद न होने पर उसे बट्टे खाते डालना या पाड़ना कहते हैं।