अक्षर: ब
अक्षर 'ब' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंबरद बिसाहन जात हौ कंता। कबरा के जिन देखियो दंता।।
ऐसा बैल जिसके शरीर पर धब्बे पड़े हों अच्छा नहीं होता। खरीदने के लिए उसके दाँत भी नहीं देखना चाहिए।
बरस लगीं ऊतरा1, अन्न न खायें कूतरा।
(1-सत्ताईस नक्षत्रों में से एक नक्षत्र जो क्वाँर के महीने में लगता है। उत्तरा फाल्गुनी।) उत्तरा नक्षत्र में पानी बरसने से रबी की फसल को विशेष लाभ होता है।
बरस लगे अगनौआ, पटौ फेर वो दौआ1।
(1-अहीर, किसान।) सावन के महीने में पुष्य नक्षत्र में लगातार वर्षा होने से भूमि को अच्छी तरह जोतने-बखरने का अवकाश नहीं मिलता। अतः किसान को उपदेश दिया गया है कि पुष्य-नक्षत्र का जल बरस रहा है। भलाई इसी में है कि खेती के लिए पट्टे पर जो जमीन ली है वह वापिस कर दीजिए। दे. अगन्नौआ बतर पऊँ।
बरस लगे हाती,1 गोऊँ टिके छाती।
(1-हस्त नक्षत्र।) उत्तरा की तरह इसका जल भी रबी की फसल के लिए लाभदायक होता है।
बरसै कऊँ, पै कड़ै तौ ओरछे के पुल1 तरें हो।
(1-झाँसी-मानिकपुर लाइन पर ओरछा के पास बेतवा पर बना रेल का पुल।) पानी कहीं बरसे पर निकलेगा तो ओरछे के पुल के नीचे होकर ही। अर्थात कोई बात यदि कहीं हुई है तो वह कभी न कभी स्वयं सामने आयेगी ही। उसके लिए चिन्तित होने की आवश्यकता क्या ?
बरसो राम झड़ाझड़ियाँ। खाये किसान मरै बनियाँ।।
वर्षा ऋतु आरंभ होने पर लड़के कहा करते हैं।
बराई और बतेसन फरी।
गन्ने का पेड़ और उसमें बताशे लगे हुए। अच्छाई में और भी अच्छाई।
बराती तौ अपने अपने घरै चले जेयें, काम दूल्हा दुलैया सें परै।
फालतू आदमी काम में अड़ंगा डाल कर अलग हो जाते हैं।
बराती भौत हैं, घरई घर के जे लो।
बराती बहुत हैं, पहिले घर के ही सब जीम लो। ऐसा न हो कि बाहर बाले खा जायें और घर के कोरे बैठे रहें।
बर्रन के छत्ता में हात डारबो।
भिड़ों के छत्ते में हाय डालना। जान-बूझ कर विपत्ति मोल लेना।
बसकारे के आँदरे कों हरोई हरो सूजत।
जो वर्षाऋतु में अंधा हो जाता है उसे केवल एक हरे रंग की स्मृति रह जाती है, और उसे चारों ओर हरा ही हरा सूझता है। दूसरों की असुविधा की कोई परवा न करके जब कोई जादमी हमेशा मजे की ही बात करता है तब कहते हैं।
बसूला ज्ञान।
बसूले से जितनी भी लकड़ी छीली जाती है यह सब उसके आगे गिरती है। उसी प्रकार का स्वार्थमय ज्ञान।
बसोर1 कौ मठा करें फिरत।
(1-बाँस के बर्तन बनाने का काम करने वाली एक जाति।) बसोर का मठा बना रखा है। ऐसी वस्तु जिसका कहीं ठिकाना न लगे।
बहुत गई थोरी रई।
बहुत उम्र बीत गयी, थोड़ी रही है। वह भी भगवान इज्जत के साथ काट दे।
बहुपति, त्रियपति, बालपति, बिना पतिहि कौ बेस। / तुलसी ऐसे देश को पत गये कहा अँदेश।।
जिस देश के बहुत से मालिक हों, अथवा जहाँ स्त्री या बालक शासक हों, अथवा जहाँ कोई शासक ही न हो, तो ऐसे देश के नष्ट होने में क्या संदेह ?