अक्षर: र
अक्षर 'र' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंरहमन चाक कुमार कौ माँगें दिया1 न देय। / छेद में डंडा डार कें चहे नाँद लै लेय।।
1-दीपक, छोटी मलसिया।
रहमन साँचे सूर कों बैरी करत बखान। रहमन सोई मीत है भीर1 परें ठहराय।
(1-कष्ट, विपत्ति।) सच्चे शूरवीर की प्रशंसा शत्रु भी करते हैं।
राँग सो ढँरका दो।
राँगा जैसा ढुलका दिया। धीरे से, अथवा ढंग से अपनी बात कह देना। पिघला हुआ राँगा इतनी आसानी से लुढ़कता है कि पता नहीं चलता।
राछरी1 कों घोड़ा माँगो, पाँव फेरें आइयो।
(1-विवाह के दिन मंडपगृह में प्रवेश करने के पूर्व वर के द्वारा की जाने वाली कन्या के घर की परिक्रमा, जो प्रायः घोड़े पर बैठ कर की जाती है।) राछरी के लिए घोड़ा माँगा और कहते हैं कि अभी लौट कर आना। कोई वस्तु जब मौके पर माँगने से न मिले और बहाना लेकर उसके लिए टरका दिया जाय तब कहते हैं।
राज के लुटे और फागुन के कुटे कों कोऊ नईं पूंछत।
राजा के द्वारा लूट लिये गये और होली के अवसर पर पिट गये की कौन फिक्र करता है ?
राजन की राजा कयें, बाच्छन1 की को कये।
(1- बादशाहों की।) बड़ों की बात बड़े ही कह सकते हैं, परन्तु जो बहुत बड़े हैं उनकी कौन कहे ?
राजा करन कौ पारो।
राजा कर्ण का पहर, अर्थात दान का समय। सूर्य अथवा चन्द्र ग्रहण के समय भंगी बसोर दान माँगते समय कहते हैं।
राजा कौ धन तीन खायें; रोरा, घोरा और दंत निपोरा।
राजा का धन तीन बातों में खर्च होता है, इमारतें बनवाने में, फौज-फाँटा रखने में या खुशामदी दरबारियों में।
राजा बुलायें, ठाँड़ी आवे।
बड़े आदमियों से सब डरते हैं। राजा ने बुलाया तो दौड़ी चली गयी।
राजा बोले दल हाले। राजा मरतन तौ मर गये, पै हँसबो नईं गओ।
कठिन दुःख भोगते हुए भी जब कोई अपनी आनबान न छोड़े तब प्रायः व्यंग्य में।
राजा हैं, सेरक सोनों भुसई में।
बड़े आदमियों की चर्चा करते समय कहते हैं कि उनका क्या कहना, सेर भर सोना तो उनके यहाँ यों ही भुस में पड़ा रहता है।
राजी-बिरजी दो जनें। झक मारें सौ जनें।।
दो आदमी किसी मामले में राजी हों तो कोई क्या कर सकता है।