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अक्षर: र

अक्षर 'र' से शुरू होने वाली कहावतें

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राँड़ के पाँव सुहागिन लागी, होओ न बाई मोई सी।

जिसके भाग्य में सुख नहीं उसे सुखी बनाने का प्रयत्न करना।

राँड़ को साँड़।

विधवा का लड़का, जो पिता के न होने से प्रायः उच्छृंखल बन जाता है।

राँड़ कौ रोबो बिरथा नई जात।

राँड़ि का रोना और पुरवाई का चलना व्यर्थ नहीं जाता।

राँड़, साँड़ उर अरना भैंसा। जे बिचलें तौ होवे कैसा ?

राँड़, साँड़ और जंगली भैंसा, इन तीनों को नहीं छेड़ना चाहिए। बिगड़ने पर ये भयंकर रूप धारण कर लेते हैं।

राँड़ी के घर माँड़ी।

गरीब के घर आनंदोत्सव। व्यंग्य में।

राँड़ें तौ रँड़ापो तब काटें जब रँड़ुआ काटन देयँ।

विधवाएँ तो सच्चरित्र तब रहें जब रँडु‌आ रहने दें ! ठीक ढंग से रहा तो तब जाय जब मित्र लोग रहने दें।

राँड़ें राँड़ें जुर मिलों को किहि देय असीस !

एक से दुःखी मिलें तो कौन किसका दुःख बँटाये।

राँड़ें रोवें सेर सेर, ऐबाती1 रोवें दो दो सेर।

(1-अहवाती, सधवा।) दुखियों का रोना ठीक है, परन्तु जो सुखी हैं वे भी रोयें तो यह आश्चर्य की बात है। अथवा संसार में कोई सुखी नहीं। दुखी तो रोते ही हैं, सुखी उनसे भी अधिक रोते हैं।

रात भर का घोंट1 फोरी ?

(1-एक वृक्ष और उसका फल, जो चमड़ा पकाने के काम आता है।) अर्थात क्या करते रहे ? रात का काम रात में क्यों नहीं किया ?

रात रतेबा ना मिलै, छै मइना नों नोंन। / पूँछे चील चमार सों; सो बेला है कौन ?

चील चमार से कहती है कि वह बैल कौन सा है जिसे रात में चारा-दाना नहीं मिलता और छः-छः महीने तक नमक। अभिप्राय यह कि ऐसा बैल बहुत दिनों जीवित नहीं रह सकता। मरे तो माँस खाया जाय।

रानी जाये पूत।

बड़े आदमी के सपूत। व्यंग्य में।