अक्षर: र
अक्षर 'र' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंरूप की रोवे, करम की हँसे।
रूपवती लड़कियों को प्रायः अच्छा घर नहीं मिलता, और वे बैठ कर रोती है, परन्तु जिनका भाग्य प्रबल होता है वे अच्छे घर पहुँच कर सुख से जीवन व्यतीत करती हैं। भाग्य ही सब कुछ है, रूप कुछ नहीं।
रेवन ककवारे1 की कुतिया।
ऐसा आदमी जो बहुत दौड़धूप करने पर भी काम में सफल न हो। न इधर का न उधर का।
रो-रो डुकरियन गीत गाये, लरकन खाँ आवे हाँसी।
बुढ़ियों ने रो-रो कर तो गीत गाये, लड़कों को हँसी आती है। किसी के परिश्रम को न सराहना, बल्कि हँसना।
रोइँ काय ? कई--नंद ने देख लओ।
रोई क्यों? कहा-नंद ने देख लिया। कोई स्त्री अकेले में भले ही अपने पति के हाथ से नित्य पिटती रहे, परन्तु कोई यदि देख ले, विशेषकर देखने बाली ननद हो, तो वह रो पड़ेगी। दूसरे के सामने अपमान बर्दाश्त नहीं होता।
रोउत काय ? कई- भगवान् ने सकल ऐसी बनाई ?
रोते क्यों? कहा- भगवान ने शकल ही ऐसी बनायी ? सदैव मुँह फुलाये रखने वाले के लिए कहते हैं।
रोउत गये, मरे की खबर ल्याये।
बेमन से काम करना। अनिच्छापूर्वक तो गये और फिर लौट कर बुरी खबर लाय।
रोउत हतीं और सासरे में मिलीं।
बहाना मिलने पर मन चाहा काम करना। ससुराल में यदि मायके का कोई आदमी मिल जाय तो स्त्री को रुलाई आ जाती है।
रोग कौ घर खाँसी। लड़ाई कौ घर हाँसी।।
खाँसी बड़े रोगों की शुरूआत होती है और अवांछित समय पर हँसना भी झगड़े पैदा कर देता है।
रोटियन कों रये, बई में ओले-झोले।
रोटियों पर नौकर रहे, उसमें भी झोलझाल। कम मजदूरी पर काम करना और वह भी पूरी न मिलना।
रोटी ऊपर साग। मोरें तौ नित्तई फाग।।
घर में रोटी और साग खाने को हो, तो क्या पूछना ? नित्य फाग-दिवाली है।
रोयें बनें ना गायें, मातेजू मों बायें।
कुछ करते-धरते न बनना। अक्क-बक्क भूल जाना।
रोवे कों हतीं और मुंस ने मारो।
रोने को थी और इतने में पति ने मार दिया। रोने का बहाना मिल गया।
रौन कुमरई की कुतिया - न इधर की न उधर की।
गढ़ाकोटा के पास रोन और कुमरई गाँव है वहाँ की एक कुतिया की भी ऐसी ही दुर्गति हुई वहाँ उस कुतिया की समाधि है।