अक्षर: र
अक्षर 'र' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंराम बिना दुख कौन हरे। बरखा बिन सागर कौन भरे।। / लच्छमी1 बिन आदर कौन करे। माता बिन भोजन कौन धरे।।
(1-गृहलक्ष्मी, पत्नी।) राम ही सबके दु:खों का निवारण करते हैं। वर्षा ही जल की आपूर्ति करती है पत्नी ही पति का आदर और माँ के द्वारा पकाया हुआ भोजन श्रेष्ठ होता है।
राम भजन कों टेढ़े-मेढ़े, आल्हा कों अन्यारे। जो कऊँ सुन पायें फाग-दिवारी, खोद खायँ गलयारे।।
राम भजन में तो मन नहीं लगता, परन्तु आल्हा सुनने के लिए सदैव तैयार। और यदि कहीं फाग-दिवारी के गीत हो रहे हों तो क्या पूछना। रास्ता ही खूंद डालें।
राम भरोसे जे रहें, पर्वत पै हरयायँ। / तुलसी बिरवा बाग के, सींचत ही कुम्हलायँ।।
ईश्वर पर विश्वास ही फलदायी है।
राम राम भजें जा, जई गैल धरें जा।
राम का भजन करो और जिस रास्ते जा रहे हो उसी पर चले चलो।
रिन की अगाई, ब्याव की पछाई।
ऋण की अगाड़ी, विवाह की पिछाड़ी, दोनों कष्टदायक होती है। ऋण लेकर बाद में ब्याज समेत चुकाना पड़ता है और विवाह में, उसका सब प्रबंध पहले से ही करना पड़ता है। बाद में छुट्टी मिल जाती है।
रीते कुआ पतोरन नइँ भरत।
रीते कुए पत्तों से नहीं भरते। महत्त्वाकांक्षी थोड़े में संतुष्ट नहीं होता।
रूखी जुरें ना, चुपर कें चायँ।
रूखी (रोटी) तो खाने को मिलती नहीं, चुपड़ कर चाहते हैं।
रूखी-सूखी नोंन से, बाबाजी कयें कौन सें।
रूखी-सूखी नमक से खा लेते हैं, बाबाजी अपनी विपत्ति किससे कहें ?