अक्षर: ल
अक्षर 'ल' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंलड़ें साँड़ बारी कौ भुरकन।
दो बड़े आदमियों की लड़ाई में बीच के छोटे आदमी मारे जाते हैं।
लपकी गाय गुलेंदे1 लाय। बेर बेर महुआ तर जाय।।
(1-महुआ नामक वृक्ष का पका फल जो खाने में मीठा होता है।) मुफ्त का माल खाने की आदत पड़ जाने पर बार-बार उसी जगह जाना जहाँ खाने को मिलता है।
लपसी सी चाटत।
किसी की बातचीत के बीच में बार-बार बोल उठने वाले के लिए कहते हैं।
लंपा कैसे ऐंठत।
लंपा की तरह ऐंठते हैं। बहुत अकड़ते हैं। घमंड करते हैं। सीधे मुँह बात नहीं करते। लंपीले घास पर पानी डालने से वह एँठता है।
लंपा1 कैसी बोंड़ी खटकबो।
(1-एक घास का काँटा जो बहुत बारीक होता है और चुभ जाने पर कसकता है।) हृदय में किसी बात का चुभ जाना और बराबर खटकना।
लबा फँसो, तीतर फँसो, तू कित फँसी बटेर। / संगत के परभाव सें, रै गई आँख नटेर।।
बुरे के साथ रह कर निर्दोष भी कष्ट भोगते हैं।
लरका की आँखें छोटी काय ? कई बेई तो खोद-खोदकें काड़ी।
लड़के की आँखें छोटी क्यों? कहा- उनको ही तो खोद-खोद कर निकाला।
लरका के भाग्गन लरकौरी जियत।
पुत्र के भाग्य से पुत्रवती जीवित रहती है। एक के भाग्य से दूसरे का भाग्य लगा रहता है।
लरका कोऊ कौ क्वाँरो नइँ रत।
साधन होना चाहिए, किसी का कोई काम रुका नहीं रहता।
लरका तौ अपनो ब्याउत, इतै मूँछें की पै मरोरत।
लड़का तो अपना ब्याहते हैं, यहाँ मूँछें किस पर मरोड़ते हैं। कोई आदमी निःस्वार्थ भाव से किसी के काम में सहायता कर रहा हो परन्तु वह उल्टे उस पर नाराज हो पड़े तब।
लरका भये सयाने, दालुद्दर गये भयाने1।
(1-दूसरे ही दिन, सबेरे।) लड़के जब खाने-कमाने लायक हो जाते हैं तब घर से दरिद्रता बिदा माँग जाती है।
लरका सीके नाऊ कौ, मूँड़ कटै किसान1 कौ।
(1-गाँव में नाई, धोबी आदि जिन लोगों के यहाँ नियमित रूप से काम करते है वे उनके किसान कहलाते हैं।) कोई नौसिखिया जबर्दस्ती दूसरे के काम में हाथ डाल कर उसे बिगाड़ दे तब।
लरन जू, मरन जू, चिरंजू।
लड़ कर, मरने की धमकी देकर और 'चिरंजीव रहो' इस तरह का आशीर्वाद देकर, जैसे भी बने तैसे, अपना कार्यसिद्ध करने वाले के लिए।
लस्कर कों का डुकरयई पीसें ?
फौज के लिए क्या बूढ़ी औरतें ही पीसेंगी? अर्थात यह काम क्या मुझे ही करना पड़ेगा ?