अक्षर: ह
अक्षर 'ह' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंहंस की चाल टीटरी चली, गोड़े उठाके भों में परी।
दूसरों का अनुकरण करके चलने में हानि उठानी पड़ती है।
हस्त बरसें तीन होयँ, साली, सक्कर, मास। / हस्त बरसें तीन जायँ तिल, कोदों उर कपास।।
हस्त नक्षत्र में पानी बरसने से धान, ऊख, और उर्द की फसल को लाभ तथा तिल, कोदों और कपास को हानि पहुँचती है।
हा-हा लों बिनती सौ लों गिनती।
जैसे सौ तक गिनती की सीमा है उसी तरह कोई हा-हा खाकर ही बिनती कर सकता है। इससे अधिक क्या करे ?
हाँई कौ मरे, नाँई कौ जिये।
किसी आदमी से 'हाँ' कह देने पर बाद में काम न किया जाय तो निराशा से वह मरने तुल्य हो जाता है, परन्तु पहिले से ही किसी को 'ना' कर दी जाय तो उसकी कोई हानि नहीं होती।
हाकिम के तीन और साना के नौ।
हाकिम को रिश्वत में तीन देने पड़ते हैं तो चपरासी माँगता है नौ!
हाकिमी गरम की, दूकानदारी1 नरम की, दलाली बेसरम की, सराफी भरम1 की। / दौलत करम की, बात मरम2 की, और आढ़त धरम की।
(1-दूकान में कितनी पूँजी लगी है, अथवा कितना पैसा पास में है इस बात का खुल न पाना। 2-मर्म, सार।)
हाजिर में हुज्जत नईं और गैर की तलास नईं।
जो वस्तु मौजूद है उसे देने में कोई आपत्ति नहीं, और जो नहीं है उसे तलाश करने नहीं जायेंगे। अथवा जो लोग मौजूद हैं उनका स्वागत है, जो नहीं हैं उनकी तलाश क्या करनी ?
हात भर लड़इया1, नौ गज पूँछ।
(1-सियार, गीदड़।) छोटा आदमी बड़ा आडम्बर करे तब कहते हैं।