अक्षर: ह
अक्षर 'ह' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंहात में कौरा, मूँड़ में टोंकर।
हाथ का कौर सिर में ले जाना। बेढंगा काम करना।
हात से पिल्ला छोड़कें कूर कूर करत।
हाथ से पिल्ला छोड़ कर बुलाते हैं, कि आजा, आजा। हाय में आयी हुई वस्तु को जान बूझ कर निकाल देना और बाद में उसे प्राप्त करने की चेष्टा करते फिरना।
हात हलाउत चले आये।
हाथ हिलाते चले आये। अर्थात जिस काम को करने के लिए भेजा था बह करके नहीं आये। यों ही खाली हाथ वापिस आ गये।
हात-पाँव के कायले1 मों में मूँछें जायँ।
(1-काहिल, आलसी।) इतने आलसी हैं कि अपनी मूँछों को भी नहीं सँभाल सकते ! मूल कहावत इतनी ही है, परन्तु किसी ने इसमें यह पंक्ति भी जोड़ रक्खी है- 'मूंछ बिचारी का करे, हात न फेरो जाय।'
हात-पाँव सुटुकिया, पेट मटुकिया।
दुबला-पतला आदमी जिसका पेट बड़ा हो, अथवा जो बहुत खाता हो।
हाती कड़ गओ, पूँछ रै गई।
किसी काम का बहुत सा अंश हो जाना और थोड़े में असमंजस रहना।
हाती के दाँत दिखाउत के और, खात के और।
जब कोई आदमी कहे कुछ और करे कुछ तब प्रयुक्त।
हाती के दाँत बायरें कड़े सो कड़े।
एक बार कोई आदमी बदनाम हुआ सो हुआ। अथवा एक बार किती का भेद खुला सो खुला।
हाती कों मकोरई1 सूजत।
(1-मकोरा, एक जंगली कटीली झाड़ी और उसका फल।) हाथी को मकोरा ही सूझते हैं। जिसे जो वस्तु प्रिय होती है उसे वही दिखायी देती है।
हाती को महावतियन की का कमी ?
हाथी को महावतियों की क्या कमी ? बड़े आदमियों को सब वस्तुएँ सुलभ रहती हैं।
हाती कौ बोज हाती (अ) ई उठाउत।
हाथी का बोझ हाथी ही उठाता है। बड़ों के काम बड़ों से ही सँभलते हैं।
हाती तुले ताँ गदा पासंग1 में।
(1-तराजू के दोनों पलड़ों को बराबर करने के लिए रखा गया बाँट।) जहाँ बड़ी चीज का मोल-भाव हो रहा हो वहाँ छोटी को कौन पूछता है?
हाती फिरै गाँव गाँव, जीको हाती बाको नाव।
जिसकी जो वस्तु होती है वह उसी की कहलाती है, फिर वह किसी भी जगह रहे।
हाती-घोड़ा बये जायें गदा कये कित्तो पानी।
बड़े-बड़े जिस काम को नहीं कर सकते वहाँ छोटे अपनी करतूत दिखाने आयें !