अक्षर: ह
अक्षर 'ह' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंहार मानी न्याव पठानी।
दो में से कोई आदमी अपनी जिद छोड़ दे तो झगड़ा मिट जाता है।
हारिये न हिम्मत, बिसारिये न राम, जाही बिध राखे राम ताही बिध रहिये। / हारे की बिसराम।
परास्त होकर चुप बैठ जाना।
हारे कौ हरनाम।
मनुष्य से जब कुछ और करते-धरते नहीं बनता तब भगवान का भजन सूझता है।
हाले फूले हम फिरें, होत हमारो ब्याव। / तुलसी गाय बजाय कें, देत काठ में पाँव।। / हा-हा खायँ बूढ़े नई ब्याय जात। (अथवा हा हा खा
किसी काम में अपनी अधिक गरज दिखाने से वह पूरा नहीं होता।
हिन्न1 के भाई छिकारा2, बे जायें दस, तौ बै जायें बारा।
(1-हिरन। 2-चीतल, स्वर्णमृग।) कोई किसी से कम नहीं।
हिसाब जौ जौ कौ, बखसीस सौ सौ कौ।
हिसाब एक एक कौड़ी का करना चाहिए। इनाम में चाहे जितना देवे।
हीरन कौ का बंजियत ?
हीरे को लेकर बेचने क्या जाना ? वह तो घर बैठे ही बिकता है।
हीरा कों कीरा1 बिगारत।
(1-हीरे के भीतर पड़ी हुई लकीर जिससे हीरे का मोल कम हो जाता है।) एक साधारण दोष भी बड़े आदमियों की महत्ता को कम कर देता है।
हीरा मुख से ना कहे लाख हमारो मोल।
बड़े आदमी अपने मुँह से अपनी प्रशंसा नहीं करते।
हुन्न1 बरस रई।
(1-हुन, (सं. हूण) मोहर, अशर्फी, सोना।) सोना बरस रहा है। बहुत लाभ हो रहा है।
हुलहुलानी सो धर पलानी।
गाय सुहलाते ही पलहा गयी। इच्छा होते ही किसी काम को करने के लिए तैयार हो जाना।
हो गओ ब्याव, कोऊ मोरो का करत ?
काम निकल गया, अब मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा ?
होती की धोती, अनहोती की लँगोटी।
मिल गयी तो धोती पहिन ली, नहीं तो लँगोटी से ही काम चला लिया।