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अक्षर: ह

अक्षर 'ह' से शुरू होने वाली कहावतें

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हाय-हाय करतन जनम बीतो।

जन्म भर संसार के झगड़ों में फँसे रहे।

हार मानी न्याव पठानी।

दो में से कोई आदमी अपनी जिद छोड़ दे तो झगड़ा मिट जाता है।

हारे कौ हरनाम।

मनुष्य से जब कुछ और करते-धरते नहीं बनता तब भगवान का भजन सूझता है।

हाँसी की साँसी।

हँसी में कही हुई बात का सच निकल आना।

हिन्न1 के भाई छिकारा2, बे जायें दस, तौ बै जायें बारा।

(1-हिरन। 2-चीतल, स्वर्णमृग।) कोई किसी से कम नहीं।

हिसाब जौ जौ कौ, बखसीस सौ सौ कौ।

हिसाब एक एक कौड़ी का करना चाहिए। इनाम में चाहे जितना देवे।

हींग घाँई बसात।

हींग की तरह बसाते हैं। अर्थात बुरे लगते हैं। सुहाते नहीं।

हीरन कौ का बंजियत ?

हीरे को लेकर बेचने क्या जाना ? वह तो घर बैठे ही बिकता है।

हीरा कों कीरा1 बिगारत।

(1-हीरे के भीतर पड़ी हुई लकीर जिससे हीरे का मोल कम हो जाता है।) एक साधारण दोष भी बड़े आदमियों की महत्ता को कम कर देता है।

हीरा मुख से ना कहे लाख हमारो मोल।

बड़े आदमी अपने मुँह से अपनी प्रशंसा नहीं करते।

हुन्न1 बरस रई।

(1-हुन, (सं. हूण) मोहर, अशर्फी, सोना।) सोना बरस रहा है। बहुत लाभ हो रहा है।

हुलहुलानी सो धर पलानी।

गाय सुहलाते ही पलहा गयी। इच्छा होते ही किसी काम को करने के लिए तैयार हो जाना।

हो गओ ब्याव, कोऊ मोरो का करत ?

काम निकल गया, अब मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा ?

होओ परोसिन मोई सी।

दूसरों को अपना जैसा बनाने की इच्छा करना।

होती की धोती, अनहोती की लँगोटी।

मिल गयी तो धोती पहिन ली, नहीं तो लँगोटी से ही काम चला लिया।