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अक्षर: क

अक्षर 'क' से शुरू होने वाली कहावतें

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कऊँ की ईंट कऊँ कौ रोरा। भानमती1 ने कुनबा जोरा।।

(1.ये दक्षिण देश की एक जादूगरनी थीं। कुछ लोग इन्हें राजा भोज की पत्नी भी बतलाते हैं।) इधर-उधर की वस्तु इकट्ठी करके कोई चीज तैयार करना।

कऊँ डूबे, कऊँ उखरे।

कहीं डूबे, कहीं निकले। कुछ कहा, कुछ किया।

कऊँ पनइँयन साँप मरे हैं?

कहीं जूतों से भी साँप मरे हैं? दुष्ट को मारने के लिए तो पूरा साधन चाहिए।

कओ बाई, काये पै रूठीं ? कई सूप चल्लाँ पै।

पूछा- क्यों बहिन क्यों रूठी हो ? कहा- सूप चलना पर। व्यर्थ रूठनेवाली स्त्री के लिए प्रयुक्त।

ककरा से गाड़ी अटक गई।

नाम मात्र की बाधा से कार्य की प्रगति रुक गयी।

ककरी के चोर खों गतकन समझा लो।

ककरी के चोर को घूँसे मार कर ठीक कर लो। जैसा अपराध है वैसा दंड दे लो।

कका बुआ दईं राहरें, रै गईं असड़ा तान। किरपा भई रगवीर की, परी हलावै कान।।

दोनों भाइयों में कलह थी। बड़े भाई की मृत्यु के बाद छोटे भाई (चाचा) ने अपने भतीजे को अरहर (तुअर) बोने की सलाह दी जो तात्का़लिक नकदी फसले नहीं है। संयोगवश राजस्था नी बंजारों की टोली उसके अरहर के खेत से गुजरी। उसमें ऊँट, गधे, खच्च र थे। उन सभी को अरहर के खेत की छाया और नमी अच्छी लगी। एक मादा खच्चउर वही खेत में विश्राम करने लगी जिसकी खुर्जी में हीरा जवाहरात भरे थे। बंजारों की टोली बिना ध्या न दिए आगे बढ गई। भतीजा (बड़े भाई का पुत्र) जो अपनी फसल की प्रतीक्षा कर रहा था। अकस्मा त एक दिन अपने खेत पर पहुँचा उसे रेंकने की आवाज सुनाई दी उसने देखा कि मादा खच्चकर वहाँ आराम कर रही है और कान हिला रही है। आषाढ़ मास में तनी हुई अरहर रघुवीर की कृपा से उसे उस खच्च र के पास हीरे जवाहरात मिल गए। सच है भगवान की कृपा से किसी के बुरा चाहने का प्रतिकूल प्रभाव होता है अर्थात् अच्छाव ही होता है। इसी से किसी कवि ने कहा है।

कखरी लरका गाँव गुहार।

घर में वस्तु रखी रहने पर भी बाहर तलाश करना।

कच्चौ काम।

ऐसा काम जो मजबूत नहीं।

कछवारे1 बगार नई लगत।

(1. तरकारी का खेत।) जहाँ का काम वहाँ ही किया जाता है। बघार हँड़िया में ही लगता है, कछवारे में नहीं।

कछू झार झरौ, कछू प्याँर झरौ।

कुछ झाड़ से दाना निकला और कुछ भूसे से ! कुछ तो काम पहिले हुआ और कुछ अब ! व्यंग में।

कटी उँगरिया पै नई मूतत।

कटी उँगली पर नहीं मूतता है। समय पर जरा भी काम नही आता है। लोगों का विश्वास है कि कटी उँगली पर तुरंत पेशाब करने से पीड़ा कम हो जाती है, और घाव भर जाता है। किसी व्यक्ति के समय पर काम न आने पर प्रयुक्त।

कठवा की हँड़िया एकई बेर चड़त।

काठ की हाँड़ी एक ही बार चढ़ती है।

कड़वारे के कोदों खायँ, ठसक के मारें मरी जायें।

उधार लेकर कोदों खाती हैं, फिर भी ठसक के मारे मरी जाती हैं।

कड़वारो काड़ तीजा करी।

उधार लेकर हरतालिका व्रत किया ! उधार लेकर काम चलाने वालों पर व्यंग।

कड़ाकड़ बजे थोथे बाँस।

निकम्मे और बातूनी आदमी के लिए कहते हैं।