अक्षर: क
अक्षर 'क' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंकपूर खुआयें सत्त नईं चड़त।
कपूर खिलाने से सत्त नहीं चढ़ता। कुछ अपना भी गुण चाहिए।
कफन कों बैठे।
कफन के लिए बैठे हैं। बिलकुल गरीब हैं। कफन के लिए भी पैसा नहीं।
कबसें राजा1 ईसुर भये, कोदों के दिन बिसर गये।
(1.भैया के अर्थ में व्यंग्य में प्रयुक्त। भैया कब से जगदीश्वर वन गये ? क्या वे दिन भूल गये जब कोदों खाकर रहते थे। छोटा आदमी बड़े पद पर पहुँच कर डींग मारने लगे तब कहते हैं।
कभऊँ नाव गाड़ी पै, कभऊँ गाड़ी नाव पै।
भिन्न-भिन्न प्रकार के दो मनुष्यों को भी आपस में एक दूसरे की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। नाव जव बन कर तैयार हो जाती है तब उसे गाड़ी पर लाद कर ही नदी में ले जाते हैं और गाड़ी जब नदी पार उतारी जाती है तब नाव पर चढ़ा कर ही।
कभऊँ सक्कर घना, कभऊँ मुट्ठक चना।
कभी खूब शक्कर और कभी केवल मुट्ठी भर चने। संसार में सब दिन एक से नहीं जाते, ईश्वर जो कुछ दे उसी में संतोष करना चाहिए।
कमरा कमरा की गाँठ नई लगत।
कम्बल कम्बल की गाँठ नहीं लगती। बड़ों में समझौता कराना कठिन होता है।
कमरी कौ खुड्ड मारें, अबीर कों ठिनकी फिरें।
किसी वस्तु के पाने के योग्य न होकर भी उसे माँगना।
कयें कयें धोबी गदा पै नई चड़त।
आदमी कोई काम सदैव भले ही करता रहे, पर कहने से वही काम नहीं करता।
कयें खेत की सुनें खरयान की।
कुछ कहा जाय और कुछ समझा जाय। देखति हौं ब्रज की लुगाइन भयौ धौं कहा, खेत की कहे तें खरियान की समझतीं -- ठाकुर
कर खेती परदेसे जाय। ताको जनम अकारथ जाय।।
खेती करके जो परदेश चला जाय उसका जन्म व्यर्थ जाता है, अर्थात् खेती के काम में सफल नहीं होता।
कर तौ डर, ना कर तौ डर।
कोई बुरा काम करे तो डरे, न करे तो भी ईश्वर के कोप से डरता रहे। दोनों ओर संकट उपस्थित होने पर प्रयुक्त। कोई काम करो तो मुसीबत, न करो तो भी मुसीबत।।
कर देखो दगा, जो बच जाय तगा।
किसी को घोखा देना अच्छा नहीं, उससे सदैव हानि उठानी पड़ती है।
कर लओ सो काम, भज लओ सो राम।
संसार में आकर जितना काम कर लिया और भगवान का जितना नाम ले लिया उतना ही अच्छा। आलस करना ठीक नहीं।
करघा छोड़ तमासें जाय। नाहक चोट जुलाहा खाय।।
अपना काम छोड़ कर दूसरे के झगड़े में पड़ने से हानि उठानी पड़ती है। इसकी एक कथा इस प्रकार है- एक बार किसी शहर में, जो एक छोटी नदी के किनारे बसा हुआ था, खूब वर्षा हुई। उससे नदी में बाढ़ आ गयी। लोग बाढ़ का तमाशा देखने जा रहे थे। किसी जुलाहे से उसके मित्रों ने कहा- चलो तुम भी बाढ़ का तमाशा देखो। जुलाहे ने इन्कार किया और कहा कि करषे में थान चढ़ा हुआ है, और इस समय कुछ बूंदाबांदी भी हो रही है, परन्तु मित्रों के बार-बार कहने से विवश होकर वह भी उनके साथ हो लिया। जिस रास्ते वे लोग जा रहे थे उस पर एक पुराना मकान था। रास्ते में पानी जोर का बरसने लगा। जब वे उस मकान के नीचे होकर निकले तो संयोग से उसकी रास्ते की तरफ की दीवार उन पर गिर पड़ी। और लोग तो बच गये परन्तु गरीब जुलाहे को गहरी चोट आयी और बेचारा मरने को हो गया। लोग उसे चारपाई पर लाद कर घर लाये। इस पर वहीं एक व्यक्ति ने, जो इस सारे किस्से से परिचित था, उक्त वाक्य कहा।