अक्षर: क
अक्षर 'क' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंकरनी के न करतूत के, खावे कों अढ़ाई सेर। (अथवा करनी न करतूत, खावें कों मजबूत।)
निकम्मे नौकर या लड़के के लिए प्रयुक्त।
करम लौट जाय, पै खाद न लौटे।
कर्म में लिखा भले ही लौट जाय, परन्तु खेत में डाली गयी खाद व्यर्थ नहीं जाती। उसका अवश्य फसल पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
करिया के आँगे दिया नई जरत।
काले सर्प के आगे दीपक नहीं जलता। अर्थात धूर्त व्यक्ति के सामने किसी की नहीं चलती। लोगों का विश्वास है कि काले सर्प के आगे दीपक बुझ जाता है।
करिया कौ मंत्र मिल जै, पै गड़ता कौ नई मिलत।
(1.एक जाति का जहरीला सर्प, जिसके शरीर पर पूंछ से लेकर सिर तक सफेद अथवा हलके पीले रंग के घेरे पड़े रहते हैं। कहीं-कहीं इसे कौड़ीला और कहीं चित्ती कहते हैं। बंगाल में यह करैत के नाम से प्रसिद्ध है। यह शान्त प्रकृति का, परन्तु फणघर की अपेक्षा कहीं अधिक जहरीला होता है और चुपचाप काटता है।) काले सर्प का मंत्र मिल जाता है, परन्तु गड़ता का नहीं मिलता। अतः धोखे से गहरी मार मारने वाले व्यक्ति के लिए कहावत का प्रयोग करते हैं।
करी न खेती, परे न फंद। घर घर डोलें मूसरचंद।।
काम में मन न लगाने वाले अल्हड़ और स्वतंत्रता-प्रिय व्यक्ति के लिए प्रयुक्त।
करुआ1 तरें ठाँड़े।
(1.नीम का वृक्ष। एक ग्रामीण देवता, जिनका निवास नीम अथवा आम के वृक्ष पर माना जाता है। इसके संबंध में एक दोहा है- आम नीम करुआ बसै, ऊमर बसत मसान। भैसासुर डाबर बसें, सिह जु प्यासे जायें।) शपथ के रूप में कहावत का प्रयोग होता है कि हम करुआदेव के वासस्थल के नीचे खड़े हैं जो झूठ बोलते हों।
करेला और नीम चढ़ो।
एक तो किसी मनुष्य का स्वभाव पहले से ही खराब हो, और फिर कुसंगत में पड़ कर अथवा ऊँचा पद पाकर वह और भी खराब हो जाय तत्र कहते हैं।
करैं बनत कै दयें बनत।
कोई काम या तो स्वयं अपने हाथ से करने से होता है अथवा पैसा देने से।
करौ खेती और भरो दंड।
खेती करो और लगान दो, अथवा नाना प्रकार की अन्य मुसीबतें सहो।
कसाई की सुकैनों और पड़ा खा जाय !
कसाई का धूप में सूखने डाला गया अनाज जानवर खा जाय, यह कैसे संभव है? टेढ़े आदमी का अनिष्ट करने से सब डरते हैं।